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Friday, August 16, 2013

एक असमाप्त यात्रा की गाथा



कथन-
एक असमाप्त यात्रा की गाथाः ' कहां शुरू कहां खतम '
' कहां शुरू कहां खतम ' एक साधारण से आदमी के असाधारण जीवन की एक ऐसी रोमांचक कथा है जिसमें पढ़नेवाले को स्वाभिमान की ठसक और विवशता की कसक गलबहियां डाले टहलकदमी करती एक साथ दिखाई देगी। दुमदार लोगों की भीड़ से अलग यह एक ऐसे दमदार आदमी की ज़िंदगी का सफ़रनामा है, हौसला जिसकी दौलत है और सपने जिसकी ताक़त हैं। और जो भले ही किसी तथाकथित बड़े समाज में पैदा न हुआ हो मगर एक बहुत बड़ा समाज उसके भीतर है इस बात की ख़बर ये जरूर बार-बार देता है। इस आत्मकथा के नायक की पूरी ज़िंदगी नई नवेली आधुनिकता से परंपरा की एक ऐसी पूछताछ है जो तथाकथित भी है और यथाकथित भी। परंपरा और प्रगति के बीच का एक सांस्कृतिक मध्यांतर है यह आत्मकथा। यह आत्मकथा तजुर्बों का एक ऐसा घर है जिसके साये में यंत्रणा और संत्रणा,परीत और विपरीत,अनुकूल और प्रतिकूल,संकल्प और विकल्प अन्यथा और नान्यथा-जैसे पृथक-पृथक संस्कारोंवाले भिन्न-भिन्न घटक अभिन्न होकर बड़े लोकतांत्रिक ढंग से चैनकुन होकर सुस्ताते हैं और बतियाते हैं।
' कहां शुरू कहां खतम ' का नायक वो परिंदा है जिसके पंखों में संभावनाओं के आकाश की मुक्तिदायी गंध पूरी शिद्दत के साथ रची-बसी है। अपने पंखों पर आकाश को तौलकर लानेवाला यह परिंदा हमारे भीतर के भी भीतर जो भीतर है उसमें बैठे परिंदे को पंखहीनता के बोध को छिटक देने की सलाह देता है। इसके पंखों से लिपटा आकाश जब मन की खिड़की से हमारे भीतर झांकता है तो अस्तित्व में विराटता के उपनिषद् उतरने लगते हैं। ईश्वर का अनुग्रह बरसने लगता है। और सारस्वत सोच के तुलसी प्रभामंडल में मांगलिक ऊर्जाएं नृत्य करने लगती हैं। चेतना की सौंधी गंध में उत्सव जागने लगते हैं।  और रेशमी उम्मीदों की बयार खूबसूरत ख़यालों के साथ अठखेलियां करने लगती है। उत्साह और उमंग की जुंबिश से सांसें झनझना उठती हैं और रोम-रोम में शुभकामनाओं के दीप दीप्त-प्रदीप्त हो उठते हैं।
संस्मरणों की उंगलियां थामे पाठक जब अनुभूतियों के अक्षांशों में पर्यटन कर रहा होता है तो स्मृतियों के नीले सागर में तैरते एक विविधवर्णी द्वीप से अनायास ही उसकी मुलाकात हो जाती है। यह द्वीप बिलासपुर है। सामाजिक सरोकारों और सदभाव के गहरे संस्कारों से लैस एक छत्तीसगढ़ी शहर-बिलासपुर। जहां के 'पेंड्रावाला'  दुकान पर बैठा आत्मकथा का नायक द्वारिका प्रसाद बल्द रामप्रसाद ज़िंदगी के तराजू में अपने हिस्से में आए खट्टे-मीठे अनुभवों को बड़े ही वीतरागी अंदाज़ में तौलकर समय के सुपुर्द कर देता है। ये आत्मकथा कवायद है उस पकती हुई उम्र की जो अपने पांव में यादों के स्केट्स पहनकर चेतना के गोलघर में बिना थके एक हतप्रभकारी दमख़म के साथ आज तलक दौड़ रही है। व्यक्त हो या अव्यक्त उसे अभिव्यक्त होने के लिए अस्तित्व में ही तैयार होना पड़ता है। ' कहां शुरू कहां खतम ' में अभिव्यक्ति ख़ुद अपने को अभिव्यक्त करने के लिए एक जरूरी हिफाजत के साथ ऐसी पारदर्शी और इकहरी शख़्सियत अख़्तियार करती है जिसे तंगखमोली दूर-दूर तक कहीं छू नहीं सकी है। ये अभिव्यक्ति बहुत कीमती है। जोकि बंजर होती संवेदनाओं और हांफते-कांपते रिश्तों के मलबों को लांघकर,तमाम अनकही उदासियों के अक़्स को चीरकर परंपरा की अंधेरी सुरंगों में नए सोच की रोशनी भरने का ऋषिकर्म करती है। इसी के बूते यह आत्मकथा अभिव्यक्ति का अनुष्ठान और प्रतिष्ठान दोनों एक साथ बन जाती है। ये कथा आजन्म तटस्थ दृष्टा बने रहने के दीर्घ सात्विक अभ्यास का  एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है। जो परिवर्तनकारी जलूस की मशाल भी है और आस्था के मंदिर में महकती भावनाओं की धूप-अगरबत्ती भी। ये आत्म कथा संवेदनाओं का न्यास भी है और उपन्यास भी। जिससे उपजी समझ हमें बेचारगी से नहीं जिंदगी से अहोभाव के साथ बतियाने का सलीका समझाती है। इस आत्मकथा की अटूट दिलचस्प कथन-भंगिमा एक मौन आमंत्रण है..ज़िंदगी की असमाप्त यात्रा में शामिल होने का। जिसका महज़ एक मोड़ है यह कथा,मंजिल नहीं। अनंत की मंजिल होती भी कहां है? जिंदगी भी अनंत है। जिसका न कोई आदि है न अंत। ये कथा एक ज़िंदगी की कथा है। इसलिए इसकी चिरंजीवता असंदिग्ध है। आइए... इस कालजयी सफ़र के हम भी समय-सापेक्ष हमसफ़र बनें। जिसके नैपथ्य से एक सनातन प्रश्न हमेशा और अहिर्निश गूंजता रहता है कि कहां शुरू,कहां खतम? यह आत्म-कथा हमें ढंग सिखाती है चिंतन की सीढियों से अपने अस्तित्व के भीतर उतरने का। अपने को खंगालने का। भीतर की इस दौड़-धूप में ही शायद इस प्रश्न का उत्तर मिल जाए कि ऐ ज़िदगी तू ' कहां शुरू कहां खतम ? ' तथास्तु...
                                                      -पंडित सुरेश नीरव
                                                      (चिंतक,कवि,पत्रकार)
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