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Thursday, November 14, 2013

एक ग़ज़ल

सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति-
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अपने चाहनेवालों की महफिल में लीजिए आज फिर हाज़िर हूं अपनी एक ग़ज़ल के साथ। शायद आपको पसंद आए। अपनी राय जरूर दीजिएगा।
-सुरेश नीरव
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संभालता क्यूं है
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तू मुफलिसी के ये किस्से उछालता क्यूं है
परायी जेब में हाथों को डालता क्यूं है

जो दिल में ख़ौफ है मूसल की चोट का इतना
सर ओखली में से बाहर  निकालता क्यूं है

बना है शहर का हर नंगा जान का दुश्मन
दिखा के शान लंगोटी संभालता क्यूं है

बरोज़ेईद कसाई से कह उठा बकरा
हलाल करना है मुझको तो पालता क्यूं है

जो तुझको दिखता है सबको दिखा धड़ल्ले से
तू आईना है हक़ीकत को टालता क्यूं है

हे तेरे हाथ में खंजर तो मेरे पास क़लम
तू जीत जाएगा मुझसे मुग़ालता क्यूं है

न जिनके पांव थे नीरव पिछड़ गए उनसे
हमेशा दर्द ये सीने को सालता क्यूं है ?

-पंडित सुरेश नीरव

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