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Thursday, November 25, 2010

हम जानते हैं जन्नत की हकीकत लेकिन...


ताजमहल पर श्री प्रशांत योगी और मुकेश परमार ने शायरी की है मगर इतिहास शायरी से अलग चीज है। हमें इससे की क्या आपत्ति हो सकती हैयह एक प्रेम प्रतीक है मगर इसे फैंटेसी बनाना भी कोई समझदारी नहीं है।हमें तथ्यों पड़ताल करने से नहीं कतराना चाहिए.।
प्रों ओक. बहुत सी आकृतियों और शिल्प सम्बन्धी असंगताओं को इंगित करतेहैं जो इस विश्वास का समर्थन करते हैं कि,ताजमहल विशाल मकबरा न होकरविशेषतः हिंदू शिव मन्दिर है.......आज भी ताजमहल के बहुत से कमरे शाहजहाँ के काल से बंद पड़े हैं,जो आम जनताकी पहुँच से परे हैं प्रो. ओक., जोर देकर कहते हैं कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा एवं धार्मिकसंस्कारों के लिए भगवान् शिव की मूर्ति,त्रिशूल,कलश और ॐ आदि वस्तुएंप्रयोग की जाती हैं.......ताज महल के सम्बन्ध में यह आम किवदंत्ती प्रचलित है कि ताजमहल केअन्दर मुमताज की कब्र पर सदैव बूँद बूँद कर पानी टपकता रहता है,, यदि यहसत्य है तो पूरे विश्व मे किसी किभी कब्र पर बूँद बूँद कर पानी नहीटपकाया जाता,जबकि प्रत्येक हिंदू शिव मन्दिर में ही शिवलिंग पर बूँद बूँदकर पानी टपकाने की व्यवस्था की जाती है,फ़िर ताजमहल (मकबरे) में बूँदबूँद कर पानी टपकाने का क्या मतलब....????
ओमप्रकाश चांडाल

प्रेम का कोई मजहब नहीं होता

ताजमहल   संगमरमर के पन्नों पर प्रेम की लिखी किताब है। वक्त की आंखों में देखा मुहब्बत का सपना है।और जनाब प्रेम का कोई मजहब नहीं होता। हम इसे सिर्फ अहसास करें,रूह से महसूस करें, यही ताजमहल को जीने का सलीका है।
मुकेश परमार