सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...
(काकोरी कांड के महानायक पंडित रामप्रसाद बिस्मिल )
आज काकोरी कांड के महानायक पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के अनुजवत साथी जनाब अशफाकउल्ला वारसी का बलिदान दिवस है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इन्कलाब का झंडा बुलंद करनेवाले इस शायरदिल इन्कलाबी को आज ही मादरेवतन को आजाद कराने के लिए लामबंद होने के जुर्म में फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। और आज के दूसरे दिन हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के सेनापति पं. राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर की जेल में शहीद कर दिया गया था। आर्य समाजमंदिर शाहजहांपुर इन दोनों ही स्वतंत्रता सेनानियों की क्रंति की पाठशाला थी। यहीं एक और मित्र हुआ करते शे बिस्मिलजी के- सुशील बाबू। जिनका अल्पआयु में ही देहांत हो गया था। बिस्मिलजी ने इनकी ही याद में सुशील ग्रंथमाला चलाई थी और कैथराइन और मन की लहर तथा निहलिस्ट रहस्य-जैसी अपनी बेहद चर्चित पुस्तकें प्रकाशित की थीं। हमारा और हमारे मित्रों का बिस्मिलजी और उनके क्रांतिकारी साथियों के प्रति कितना अनुराग है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हम लोगों ने विगत दस वर्षों से बिस्मिल फांउडेशन संस्था बनाकर उनके प्रति अपने अहोभाव को अभिव्यक्त किया है। और सरफरोशी की तमन्ना नाम से दूरदर्शन के लिए टेली फिल्म भी बनाई। जो कि प्रतिवर्ष दूरदर्शन पर दिखाई भी जाती है। मेरे लिए बड़े गर्व की बात यह है कि बिस्मिलजी के माता-पिता तमरघार (अंबाहःजिला मुरैना के थे जो कि सिंधियाओं के कोप से बचने के लिए बाद में शाहजहांपुर चले आए थे। और इत्तफाक से मेरी जन्म स्थली भी ग्वालियर ही है। और मेरे मित्र अरविंद पथिक की शाहजहांपुर। शाहजहांपुर के फिरनी मोहल्ले में आज भी वह मकान मिटा नहीं है जिसमें कि बिस्मिलजी ने कभी जन्म लिया था। और वह मिशनरी स्कूल और मकतब भी आज तक मौज़ूद हैं जहां कि बिस्मिलजी और अशफाकुलल्ला के बड़े भाई साथ ही पढ़ा करते थे। इस महान क्रांतिकारी की जन्म स्थली की तीर्थयात्रा करने का सौभाग्य मुझे मिला जो कि हमारी फांउडेशन के महा सचिव पं. अरविंद पथिक के सौजन्य से मुझे उपलब्ध हुआ। आज भी जब-जब शाहजहांपुर जाने का सौभाग्य मिलता है मुझे गर्रा की लहरों और वादियों में बिस्मिलजी और अशफाकुल्ला आंख मिचौनी खेलते से महसूस होते हैं। आंख मिचौनी ही तो थी कि उम्र में छोटे होने के बावजूद अशफाक बिस्मिलजी से दो दिन पहले ही शहीद होकर इस सूएअदम को अलविदा कहकर जन्नतनशीं हो गए। शाहजहांपुर का शहीद पार्क जहां इन क्रातिकारियों की प्रतिमाएं लगी हैं उन्हें देखकर लगता है कि हवाओं में आज भी सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है के नगमें बिस्मिलजी गा रहे हैं और इस कोरस में उनकी हिंदुस्तान रिपव्लिकन आर्मी के कमांडर इन चीफ चंद्रशेखर आजाद,भगत सिंह अशफाकुल्ला के साथ-साथ इस कोरस में अपने सुर मिला रहे हैं। बिस्मिलजी ने कहा था कि मैं फिर भारत में ही जन्म लूंगा तय है कि वो यहीं-कहीं होंगे हमारे ही आसपास और जूझ रहे होंगे कहीं इस लंपट व्यस्था से जो उनकी अपनों की है। किसी अग्रेज की नहीं है। क्या सोचते होंगे वो,क्या बीतती होगी इनके दिल पर यह सोचकर आंखें भर आती हैं। आंख तो भरनी ही चाहिए जिनके मन में उनकी शहादत के प्रति कोई श्रद्धा का भाव है। और जिनकी आंखों में सूअर का बाल है उनके लिए काहे के बिस्मिल कहां के बिस्मिल।
काकोरी के अमर शहीद को लोकमंगल के सभी सदस्यों के भावभीने प्रणाम...
( बलिदान दिवसः20 दिसंबर)
पं. सुरेश नीरव

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