मित्रो, सन २००९ अपनी आखिरी साँसे ले रहा है। सिर्फ़ १४ दिन शेष हैं नव- वर्ष के आगमन में। आज नए साल में उस ऊपर वाले से कुछ मैंने भी दुआ की है। उस में लगता है कुछ कुबूल भी हुई हैं। बहरहाल ग़ज़ल आप सब की नज़र है।
हर तरफ़ चांदनी को नए साल में
होठों पर रागिनी हो नए साल में।
हर दिशा खुशबूओं से महकती रहे
महके फिर रात रानी नए साल में।
इस वतन में हैं जितने भी चिकने घड़े
काश हों पानी-पानी नए साल में।
दर्दो- दहशत का नामो- निशाँ ना रहे
हो हवा जाफरानी नए साल में।
अब न मकबूल फिर हो धमाका कोई
हो यही मेहरबानी नए साल में।
मृगेन्द्र मक़बूल
2 comments:
इस वतन में हैं जितने भी चिकने घड़े
काश हों पानी-पानी नए साल में।
दर्दो- दहशत का नामो- निशाँ ना रहे
हो हवा जाफरानी नए साल में।
अब न मकबूल फिर हो धमाका कोई
हो यही मेहरबानी नए साल में
वाह ये तीनो शेर बहुत अच्छे लगे। नये साल की शुभकामनायें
shukriyaa nirmala kapila ji.
nayaa saal aapke liye bhi tamaam khushiyon ki saugaat laaye aur swasthh rakhe.
maqbool
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