ये जो ज़िंदगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है
कहीं इक हसीन सा ख्वाब है, कहीं जानलेवा अज़ाब है।
कहीं छाँव है, कहीं धूप है, कहीं और ही कोई रूप है
कई चेहरे इस में छुपे हुए, इक अजीब सी ये नक़ाब है।
कहीं खो दिया, कहीं पा लिया, कहीं रो लिया, कहीं गा लिया
कहीं छीन लेती है हर खुशी, कहीं मेहरबां बेहिसाब है।
कहीं आंसुओं की है दास्तां, कहीं मुस्कराहटों का बयान
कहीं बर्क़ों की हैं बारिशें, कही तिश्नगी बेहिसाब है।
राजेश रेड्डी
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
3 comments:
बहुत सुन्दर ....
जबरदस्त...सटीक..छा गया.
mahendr mishr aur udan tashtari, aap donon kaa shukriyaa.
maqbool
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