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Saturday, December 12, 2009

ग़ज़ल

ये जो ज़िंदगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है
कहीं इक हसीन सा ख्वाब है, कहीं जानलेवा अज़ाब है।

कहीं छाँव है, कहीं धूप है, कहीं और ही कोई रूप है
कई चेहरे इस में छुपे हुए, इक अजीब सी ये नक़ाब है।

कहीं खो दिया, कहीं पा लिया, कहीं रो लिया, कहीं गा लिया
कहीं छीन लेती है हर खुशी, कहीं मेहरबां बेहिसाब है।

कहीं आंसुओं की है दास्तां, कहीं मुस्कराहटों का बयान
कहीं बर्क़ों की हैं बारिशें, कही तिश्नगी बेहिसाब है।
राजेश रेड्डी
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल

3 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुन्दर ....

Udan Tashtari said...

जबरदस्त...सटीक..छा गया.

Maqbool said...

mahendr mishr aur udan tashtari, aap donon kaa shukriyaa.
maqbool