यह मंच आपका है आप ही इसकी गरिमा को बनाएंगे। किसी भी विवाद के जिम्मेदार भी आप होंगे, हम नहीं। बहरहाल विवाद की नौबत आने ही न दैं। अपने विचारों को ईमानदारी से आप अपने अपनों तक पहुंचाए और मस्त हो जाएं हमारी यही मंगल कामनाएं...
Search This Blog
Tuesday, December 15, 2009
विश्वास
मैं उठा नित शीश अपना विश्व में अविरत चला हूँ । तुम मुझे क्या रोक सकते आपदाओं में पला हूँ। उठ रहा दिनमान-सा मैं ताप-दुःख सब कुछ सहूंगा तुम बिछा दो शूल पथ में फूल-सम चुनता रहूँगा। अनिल (15-12-2009 , ७.३० सायं )
1 comment:
बढ़िया रचना बधाई...
Post a Comment