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Thursday, February 4, 2010

... जमीं सदियों की प्यासी दे गया


एक पल में जिंदगी भर की उदासी दे गया

वो जुदा होते-होते कुछ फूल बासी दे गया

नोंच कर शाखों के तन से खुश्क पत्तों का लिबास

ज़र्द मौसम बाँझ ऋत को बे-लिबासी दे गया

लोग मलबों में दबे साये भी दफ़नाने लगे

ज़लज़ला अहले-ज़मी को बदहवासी दे गया

ठन्डे झोकों की रगों में घोल कर अपना धुआं

एक दिया अंधी हवा को खुद साँसे दे गया

ले गया वो शख्स मुझसे अब्र बनता आसमा

उस के बदले में ज़मीं सदियों की प्यासी दे गया

प्रस्तुति : अनिल (०४.०२.२०१० सायं ४.३० बजे)

3 comments:

रंजना said...

उफ़ !! लाजवाब....भाव शब्द अभिव्यक्ति ...सब बेजोड़ !!! अपने आप से मुंह से दादों की झाड़ी लगवा देने लायक रचना....

एक निवेदन है..
एक दिया अंधी हवा को खुद (की) साँसे दे गया ....
यहाँ जब "की" लगाकर मैंने पढ़ा तो मुझे लयात्मकता और भी बेहतर लगी...यह बस एक सुझाव है...आप देख लें ..कोई जरूरी नहीं की मेरी बात मानी ही जाय...

anil said...

dhanywad Ranjna ji
aasha hai aise hi sahyog banaye rakhenge.

अनिल कान्त said...

gr8 one !