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Thursday, February 25, 2010

हजामत
पंडित सुरेश नीरवजी आजकल आप हजामत नहीं बना रहे हैं किसी की तो सोचा आज मैं ही यह काम कर दूं। मैं एक ऐसा बदनसीब इंसान हूं जिसकी तुलना आज के युग में तो किसी से की नहीं जा सकती हांसतयुग के राजा हरिश्चंद से जरूर की जा सकती है जिसे कि परिस्थितियों के अंतर्गत राजा होते हुए भी एक चांडाल के यहां नौकरी करनी पड़ी थी। मेरा बॉस भी एक चांडाल है। असकी खुशामद करते-करते मेरा असली चेहरा ही गायब हो गया और मैं खुद ही चांडाल हो गया हूं। उस चांडाल ने मेरा सारा वजूद ही खत्म कर दिया है। मैं लिखने-पढ़नेवाला आदमी हूं वह मेरी योग्यता और प्रसिद्ध से परेशान होकर किसी-न-किसी बहाने अपमानित करने की जुगत लगाता रहता है। वह अपने को बुद्दिजीवी समझता है और ज़माना उसे मूर्ख मानता है। लोग उसकी मज़ाक उड़ाते हैं।वह समझता है कि उसमें ग़जब का सेंस आफ ह्यूमर है। वह आपने को अत्यंत गंभीर मानता है लोग उसे चुटकुला समझते हैं। वह बड़े-बड़े गणित बैठाकर अपने दोस्तों की तारीफ और चापलूसी करता है लोग उसकी असलियत पहचानते हैं। इसलिए कोई उसे गंभीरता से नहीं लेता है। अपने मातहतों की वह बुराई करता है उनकी जेब काटकर फोकट में ऐश करता है और जो ऐसा नहीं करते उसे वह अपना विरोधी मानता है। दो पैसे की जिसकी इज्जत न हो वह अपने को ला़ साहब समझता है। ऐसे लालबुझक्कड़ के अधीन मुझे काम करना पड़ रहा है। मुझसे बदनसीब और कौन होगा। मैं उल्टे उस्तरे से उस घटिया आदमी की आज हजामत बना रहा हूं। डरता हूं कि कहीं गुस्से में उस्तरे से साले की ग्रदन ही न उड़ा दूं । वैसे उसके गर्दन है ही कहां। गर्दन तो स्वाभिमानियों की होती है, जिसे तानकर वे चलते हैं। इस चापलूस के गर्दन है ही कहां जो मैं काट पाउंगा। मैं इसे आपके सामने ला रहा हूं हो सकता है कि इसकी शक्ल में आपको अपना ही बॉस दिखाई दे। अगर दिखे तो उसे उस्तरा मत मारना उसे थोक में जूते मारकर खत्म करना वरना अन्य हरामी चेत जाएंगे। चलिए आपको आपके बॉस की हजामत मुबारक।
एक दुखी आत्मा
ओ.चांडाल

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