शायद मैं जिंदगी की सहर ले के आ गया
कातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया
ता-उम्र ढूंढता रहा मंजिल मैं इश्क की
अंजाम ये के गर्द-ए- सफ़र ले के आ गया
नश्तर है मेरे हाथ मैं, कंधे पे मैकदा
लो मैं इलाज-ए -दर्द -ए -जिगर ले के आ गया
हजूर सनमकदे में ना आता मैं लौट कर
एक ज़ख्म भर गया था इधर ले के आ गया
प्रस्तुति: अनिल (22.03.2010 सायं ५.४५ बजे)
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