प्रसंगः मंगलवार और हनुमानजी
पंडित सुरेश नीरवजी....
हनुमानजी के बहाने आपने एक ऐसे विषय पर बहस करना चाही है जो एक सनातन बहस का संदर्भ हमेशा से रही है। लोक विश्वास का विस्तार ही धर्म है। और इस विश्वास में फेर-बदल समय के साथ होते रहते हैं। बाइबिल मे लिखा था कि सूरज पृथ्वी के चारो ओर घूमता है और यह विश्वास सदियों तक बना रहा। हमारी मान्यताओं में पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है। ग्रीक मान्यता में पृथ्वी एटलस के कंधे पर टिकी है।तो जब पृथ्वी को लेकर ही तमाम मान्यताएं रही हैं और जोकि वेज्ञानिकदृष्टि से असत्य ही थीं तो इस पृथ्वी पर प्रचलित धार्मिक मान्यताओं में वैज्ञानिकता ढ़ूंढ़ना कहां तक उचित है। धर्म और मान्यताएं हमारे बनाए हुए हैं। और इनके पीछे कभी कोई तत्कालीन आधार हो सकता है कि कोई रहा हो मगर आज भी उसे ढोना पागलपन है।शराब यदि बुरी है तो हर दिन बुरी है खाली मंगलवार को ही क्यों। और यही बात मांसाहार पर भी लागू होती है।
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