मंगलवार और वर्जनाएं
पंडित सुरेश नीरवजी...इस मुद्दे पर आपने एक बहस की शुरूआत कर एक ऐसे विमर्श को रेखांकित करना चाहा है जो साहित्य का नहीं धर्म का विषय है। और धर्म के मुद्दे आजतक अनिर्णीत ही रहे हैं क्योंकि धर्म तर्क से ज्यादा विश्वास को तरजीह देता है। और विश्वास में संदेह नहीं समर्पण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। हर धर्म के अपने विश्वास हैं मान्यताएं हैं। हो सकता है कि यह निरर्थक ही हों मगर इनसे छुटकारा कहां है। धर्म को मानते हुए तो कतई नहीं। हां जो धर्म से अलग हैं उनकी बात और है। बहरहाल चिंतन हो तो कुछ निष्कर्ष निकल भी सकते हैं।
-डाक्टर प्रेमलता नीलम000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000


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