ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल
हैं कितनी चाहतें तुझमें बता ए तनहाई
महकते फूलों में शौहरत घुली है मौसम की
वफा में इस्क को कहते हैं लोग रुसवाई
मेरा वजूद भी कब मेरा अब वुजूद रहा
घटाएं कैसी तू आंखों में अपने भर लाई
हजार सपने निछावर हैं उनकी आंखों पर
हैं ुतनीं वाबफा जितनी है उनमें गहराई
अजब तरह की शिकायत मिली है लोगों से
कसक दिलों की बढ़ा देती है पुरवाई
सजजी है आज भी सुर-ताल में तेरी यादें
लरज के बजने लगे दिल की जिनसे शहनाई।
पंडित सुरेश नीरव0000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000

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