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Saturday, February 26, 2011

मुर्ग़े को हर इक हाल में होना हलाल है।

रिश्वत के जुर्म में जो बर्खास्त हो गया
रिश्वत खिला के हो गया फिर से बहाल है।

हासिल फ़तह मक़बूल इन्हें हो या फिर उन्हें
मुर्ग़े को हर इक हाल में होना हलाल है।
मृगेन्द्र मक़बूल


Wednesday, February 23, 2011

क़ज़ी तनवीर की नई पुस्तक

रूप और रंग क़ाज़ी तनवीर की नई पुस्तक है जो सापेक्ष प्रकाशन से शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही है। इस पुस्तक में क़ाज़ी तनवीर की साठ ग़ज़लें हैं। डिमाई साइज और हार्डबाउंड इस पुस्तक की कीमत 150 रुपए है।

Tuesday, October 19, 2010

सुरेश नीरव की ग़ज़ल

ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल-ग़ज़ल
हुजूम यादों को कितने तू संग ले आई                                                                      
हैं कितनी चाहतें तुझमें बता ए तनहाई

महकते फूलों में शौहरत घुली है मौसम की
वफा में इस्क को कहते हैं लोग रुसवाई

मेरा वजूद भी कब मेरा अब वुजूद रहा
घटाएं कैसी तू आंखों में अपने भर लाई

हजार सपने निछावर हैं उनकी आंखों पर
हैं ुतनीं वाबफा जितनी है उनमें गहराई

अजब तरह की शिकायत मिली है लोगों से
कसक दिलों की बढ़ा देती है पुरवाई

सजजी है आज भी सुर-ताल में तेरी यादें
लरज के बजने लगे दिल की जिनसे शहनाई।
पंडित सुरेश नीरव
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Thursday, January 14, 2010

।अमर शहीद अशफाकउल्ला खां की एक गज़ल

दोस्तों कई दिन बाद लोकमंगल पर आया हूं ।अमर शहीद अशफाकउल्ला खां की एक गज़ल पेश-ए-खिदमत है---
सितमगर अब ये आलम है तेरे बीमारे फुरकत का
लबों पर दम है दिल में बलबला शौके शहादत का
मेरी दीवानगी पर चारागर हैरां न हो इतना
यही अंज़ाम होना चाहिए नाकाम उल्फत का
बुताने संग दिल सुनते नहीं फरियाद बेकस की
निराला ढंग है उन खुदपरस्तों की हकूमत का
मिटा कर जानों दिल अपना किसी ज़ालिम ज़फाजू पर
तमाशा अपनी आंखोम देखता हूं अपनी किस्मत का
हविस हूरों कि हो जिस में दिलाए याद गिल्मा की
जनाबे शेख मैं कायल नहीं ऐसी रियाज़त का
मज़ा जब है कि वह कह उठेंअशफाक उनका क्या कहना
गज़ल है या मुरक्का है तेरे वक्ते मुसीबत का।

Tuesday, October 14, 2008

एक चिंगारी कहीं से लाइये,

गज़ल
एक चिंगारी कहीं से लाइये,

इन बुझे शोलों को फिर भडकाइये.
इस अन्धेरे को मिटाने के लिये,

रोशनी का एक क़तरा चाहिये.
लाइये जुगनू कहीं से खोजकर ,

और हमको रास्ता दिखलाइये.
आपकी हर बात पर विश्वास है,

एक चिंगारी कहीं से लाइये,

इन बुझे शोलों को फिर भडकाइये.
इस अन्धेरे को मिटाने के लिये,

रोशनी का एक क़तरा चाहिये.
लाइये जुगनू कहीं से खोजकर ,

और हमको रास्ता दिखलाइये.
आपकी हर बात पर विश्वास है,

आप तो झूठी कसम मत खाइये.
क्या पता कोई कही ठुकरा न दे,

सबके आगे हाथ मत फैलाइये.
हर जगह सम्वेदना मिलती नहीं,

हर किसी का द्वार मत खटकाइये.
फेंकिये सारी नक़ाबें नोचकर,

असली चेहरा सामने तो लाइये

Posted by अरविन्द चतुर्वेदी
झूठी कसम मत खाइये.

आपकी हर बात पर विश्वास है,

आप तो झूठी कसम मत खाइये.
हर जगह सम्वेदना मिलती नहीं,

हर किसी का द्वार मत खटकाइये.


अरविंद चतुर्वेदी
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