मंथन-
आज मंगलवार है। आस्थावान लोगों को लिए बजरंगबली की पूजा का दिन। लोग मंदिर जाते हैं। हनुमानजी के आगे सर झुकाते हैं। सिंदूर का चोला चढ़ाते हैं। तथाकथित प्रगतिशील लोग आज के दिन मदिरापान नहीं करते हैं। मांसाहार नहीं करते हैं। बाल नहीं कटवाते हैं। नाखून नहीं कटवाते हैं। मंगल का जब इतना असर है तो फिर हमारा तो ब्लाग ही जयलोकमंगल है। जो रोज़ ही मंगल मनाता है। मगर एक प्रस्न अपने को समझ में नहीं आता है कि क्या हनुमानजी को और कोई काम नहीं है बस वो यही देखते रहते हैं कि मंगल को किसने शराब पी,किसने मांस खाया या कि कौन नाई के चला गया। सके अलावा और कोई व्यस्तता उनकी मंगलवार को नहीं होती है क्या। और जो हिंदू नहीं है उनको वो देखते ही नहीं होंगे। क्या इन बातों के पीछे कोई तर्कसंगत तथ्य है या कि महज ये हमारे अंधविश्वास हैं। आज अचानक ये बात दिमाग में कौंध गई है। अगर पके पास कोई जवाब हो तो मेरी जिज्ञासा को शांत करें। और सबसे बड़ी बात यह है कि बाल्मीकि रामायण में हनुमानजी भी सोमपान करते हैं। हनुमानजी को वानररूप में हम पूजते हैं। वानर का प्रिय भोजन फल होता है मगर मंदिरों में लड्डू और बूंदी और चने इलायचीदाने का प्रसाद चढ़ता है। क्या हम अपनी पसंद अपने भगवान पर नहीं थोपते हैं। या फिर उनके बहाने अपने स्वाद को बरकरार रखते हैं। ये कुछ प्रश्न हैं जो मेरे मन में हमेशा कुलबुलाते हैं। और मुझसे जवाब मांगते हैं। अगर आपके पास उत्तर हो तो जरूर दें। इंतजार रहेगा।
पंडित सुरेश नीरव
000000000000000000000000000000000000000000000000000


No comments:
Post a Comment