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Monday, October 18, 2010

भरत चरित्र महाकाव्य

राम का आस्तिक मत
सत प्रतिज्ञ कौशल्या लाला। भाषा बिन संशय तत्काला। ।
विप्रशिरोमणि हे जावाली । बात कही मम मंगल वाली । ।
सत्य प्रतिज्ञ कौशल्या के पुत्र श्री राम मुनि जावालि से बिना संशय के बोले कि हे विप्रशिरोमणि मुनि जावालि ! आपने बात मेरे मंगल हेतु कही है।
सुन्दर सौरभ अनुपम सोहे। परन्तु यह मुझे नहीं मोहे। ।
अति प्रिय कर्त्तव्य-सी दिखायी। पर अपथ्य-सी मुझे न भायी। ।
मुनि! यह आपकी सुन्दर, सौरभ और अनुपम बात है और बड़ी शोभित है। परन्तु यह आपकी बात मुझे नहीं मोहती है । यह अति प्रिय कर्त्तव्य- सी दिखाई देती है परन्तु मुझे यह अपथ्य-सी लगाती है। मुझे यह बात अच्छी नहीं लगती है
जिसने धर्म मर्यादा त्यागी । वह पाप में प्रवृत्त दागी। ।
तासु आचार विचार पापी । होता भ्रष्ट और संतापी । ।
हे मुनि! जिसने अपना धर्म मर्यादा त्याग दी , वह पाप में प्रवृत्त हो जाता हैऔर दागी बन जाता है। और उसके आचार विचार पापी हो जाते हैं। तथा वह भ्रष्ट और संतापी बन जाता है।
रचयिता - भगवान सिंह हंस
प्रस्तुतकर्ता- योगेश विकास

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