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Thursday, November 11, 2010

ज़िन्दगी ही तब अधूरे प्रश्न का उत्तर बनेगी

श्री प्रशांत योगीजी ने 
आज के विचार में प्रश्न किया है कि कितने नानक और कबीर पास से गुजर गए,कितनी गीता और कुरानों का स्पर्श लपेटे हम खड़े हैं मगर हमारे भीतर प्रेम का दीपक क्यों नहीं जला तो इत्फाक से आज राजमणिजी ने अमेरिकावासी राकेश खंडेलवाल का गीत प्रेषित किया जिसमें लगभग वही चिंताकुलता है जिसका जबाब योगीजी चाहते हैं। इस गीत में उस प्रश्न की कसक भी है और उत्तर देने की ललक भी। पेश है गीत की कुछ पंक्तियां-
चाँदनी यदि चाँद से आई नहीं नीचे उतर कर
बांसुरी के छिद्र में यदि रह गई सरगम सिमट कर
कोयलों ने काक से यदि कर लिया अनुबन्ध कोई
यामिनी का तम हँसा यदि भोर को साबुत निगल कर

कामना फिर और ज्यादा बाट न जोहा करेगी
ज़िन्दगी ही तब अधूरे प्रश्न का उत्तर बनेगी

शाख से आगे न आयें पत्तियों तक गर हवायें
या कली के द्वार पर भंवरे न आकर गुनगुनायें
बून्द बरखा की न छलके एक बादल के कलश से
और अपनी राह को जब भूल जायें सब दिशायें

उस घड़ी जब चेतना आ नींद से बाहर जगेगी
ज़िन्दगी तब हर अधूरे प्रश्न का उत्तर बनेगी

पंडित सुरेश नीरव
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