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Thursday, November 18, 2010

कबूतरबाजी की मुख्यधारा


 हास्य-व्यंग्य-
चाचा टीवी चौधरी
पंडित सुरेश नीरव
 जब रामप्रसादजी गांव से पहली-पहली बार दिल्ली आए तो उन्होंने लगभग हर घर की छत पर लोहे के खंभे-जैसी चीजों को लगा देखा। उन्हें लगा कि मुगलों के शहर रहे दिल्ली में आजतक लोगों के दिल में कबूतरबाजी का शौक बरकरार है। बचपन में कई बार उन्होंने नेहरूजी को भी लालकिले से शांति के प्रतीक सफेद कबूतर उड़ाते देखा था। उस वक्त शायद यही रिवाज़ था। रामप्रसाद ने सोचा कि जब बादशाहों से लेकर प्रधानमंत्रीजी तक को कबूतरबाजी का शौक था तो आम आदमी तो यूं भी बेचारा बड़े आदमियों की ही नकल करता है। शायद इसलिए ही सभी ने अपनी छतों पर तभी से कबूतरों के दड़वे बना लिए होंगे। विचारों के भंवर में डूबते-इतराते रामप्रसादजी अपने इकलौते चाचा के घर आए ही पहुंचे। उन्हें उनके घर पर भी ऐसा ही खंभा छत पर लगा देखा तो विश्वास हो गया कि चाचा नेहरू का जादू,अपने चाचा के सिर पर चढ़कर आज भी भांगड़ा कर रहा है। कमरे में घुसते ही रामप्रसादजी ने चाचा को कबूतरबाजी की मुख्यधारा में जमें रहने की बधाई दी। चाचाजी कबूतरबाजी की बात सुनकर चकरायमान हुए। उन्होंने कबूतरबाजी के कथित शौक का पूरे हार्सपावर के साथ विरोध किया और कहा- कि भतीजे...मेरे ही घर आकर, सरेआम अपने ही चाचा पर, इतना संगीन आरोप लगाते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई। अरे,अगर मैं कबूतरबाजी करता तो इस टुच्चे से जनता फ्लैट में रहता। कबूतरबाजी तो पाप सिंगर और मंत्रीपुत्रों के चोचले हैं। मैं अदना-सा आदमी क्या कबूतरबाजी करूंगा। अपनी ना औकात और ना हैसियत। रामप्रसादजी को कुछ समझ में नहीं आया कि चाचाजी कबूतरबाजी को लेकर इतने मर्मांतक ढंग से भावुक क्यों हो रहे हैं। रामप्रसादजी बोले- चचा,मैंने तो दिल्ली के अमूमन हर घर की छत पर कबूतर का दड़वा देखा है। वो आपकी छत पर भी लगा हुआ है। इसलिए मैंने ये बात कही है। चाचाजी को जब बात के भीतर की बात समझ में आई, तो वे भी ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। बिलकुल लाफ्टर शो के नवजोतसिंह सिद्धू की तरह। और फिर वो रामप्रसादजी
 को धौल जमाते हुए बोले- अरे मेरे बीरबल... ये कबूतर के दड़वे नहीं टीवी के एंटीना हैं। इन पर बैठकर ही सीरियलों के कबूतर टीवी के डब्बों में समाते हैं। चाचा ने रामप्रसादजी
 को कमरे में रखे हुए टीवी को चलाकर दिखाया। रामप्रसादजी ने गांव में बायस्कोप में आगरे की धोबिन और दिल्ली का लालकिला देखा था। आज धोबिन की पूरी फेमली को नाचते-गाते देखा तो उन्होंने मन-ही-मन एक अदद टी.वी. खरीदने की भीष्मप्रतिज्ञा कर डाली। और फिर दिल्ली से टीवी लेकर ही रामप्रसादजी वापस अपने गांव गए। गांव में पहला टीवी आया था रामप्रसादजी के घर। पेड़ के नीचे चबूतरे पर, टीवी रखकर पूरे गांव की संस्कृति नष्ट करने का पुनीत कार्य रामप्रसादजी ने ही शुरू किया था। कृतज्ञ गांववासियों ने टीवी के इस महान योगदान का सम्मान करते हुए उन्हें टीवीवाले चौधरी का खिताब देकर,अपना नैतिक फर्ज पूरा किया।  रामप्रसादजी उर्फ टीवी चौधरी इस खिताब को फिरंगियों से मिलनेवाली रायबहादुर की पदवी से भी बड़ा मानते हुए आज भी पूरी ठसक के साथ गांव के टीवी चौधरी बने हुए हैं। तय है कि भले ही रामप्रसादजी भूतपूर्व हो जाएं मगर इस खिताब से वो मरणोपरांत भी अलंकृत ही रहनेवाले हैं। आज गांव में टीवी भले ही  घर-घर में घुसपैठ कर चुका हो मगर गांव में टीवीवंश की नीव रखनेवाले टीवी चौधरी उर्फ रामप्रसाद अब भी इतिहास के स्टूल पर तनकर बैठे हैं। यूं समझिए कि इस गांव के लिए रामप्रसादजी टीवीवंश के इतिहास के स्थानीय बाबर हैं। गांव के कई प्रतिभावान छात्र तो परीत्रा में टीवी का आविष्कार किसने किया इसके जवाब में पूरे सम्मान के साथ रामप्रसादजी की ही नाम लिख आते हैं। भले ही उत्तर गलत हो मगर ऐसी गलती जिससे गांव का नाम ऊंचा हो उसे मेधावी छात्र पूरी निष्ठा से निभाने में हिचकते नहीं है । सही जवाब लिखकर वे न तो खुद शर्मिंदा होना चाहते हैं और न कभी गांव को शर्मिंदा करने के मूड में रहते हैं। रामप्रसादजी-जैसा दुर्दांत टीवीबाज गांव में ही नहीं पूरे टीवी के महकनमे में भी ढूंढे से नहीं मिलेगा। इसलिए सरकारी स्तर पर किसी ने ढूंढने की कोशिश भी नहीं की। शहर में होते तो इनका नाम गिनीजबुक या लिम्काबुक आफ रिकार्ड्स में लपककर अपने आप ही दर्ज हो जाता। रामप्रसादजी का कमरा सारे चैनलों के ड्यूटीरूमों से अकेला पंजा लड़ाने की कुव्वत रखता है। मजाल है कि कोई सीरियल रामप्रसादजी की गिद्ध दृष्टि से बचकर निकल जाए। हर सीरियल के डायलाग रामप्रसादजी को इतनी अच्छी तरह याद हैं जितने कि सीरियल के तथाकथित मूल लेखक को भी याद नहीं होंगे। वैसे भी अक्सर सीरियलों में किसी का भी नाम लेखक की जगह दिये जाने का रिवाज है,असली लिखनेवाला तो गुमनाम ही होता है। बारहसौ एपीसोडवाले  महाकाय सीरियल- सास भी कभी बहु थी, को सकुशल झेलकर रामप्रसादजी आज भी  बाकायदा जिंदा हैं। और आजकल पांच हजार एपीसोडवाला सीरियल-  सीआईडी देखने में प्राण-पण से जुटे हुए हैं। तमाम सीरियलों के कई पात्र मर चुके हैं, कई पात्र मर-मरकर के जिंदा हो गए हैं पर अपने रामप्रसादजी उन सब को निबटाकर भी नाट आउट हैं। और ईश्वर ने चाहा तो सेंकड़ों सीरियलों को निबटाकर ही रामप्रसादजी की जिंदगी का रिमोट डिस्चार्ज होगा।  सीरियलों के बीच विज्ञापनों की तरह यह भी एक अटल सत्य है कि टीवी चौधरी जिस दिन म्यूट पर आ जाएंगे,वह दिन भारत के चैनलों का सबसे ब्लैकेस्ट काला दिन होगा। रामप्रसादजी  टीवी उपभोक्ता जगत के अपने गांव स्तर के आदि मानव हैं। उनको अगर कुछ हो गया तो चैनलों के टीआरपी की सांसें उल्टी चलने लगेंगी। हे ऊपरवाले टीवी चौधरी उर्फ रामप्रसादजी को एकताकपूर के सीरियलों की तरह दीर्घायु करना। और  उनके गांव को मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा के गांव की तरह जमीदोज होने से बचाए रखना। क्योंकि चैधरी के टीवी डिब्बे में ही पूरे गांव के प्राण बसते हैं।
आई-204,गोविंदपुरम,गाजियाबाद-201001
मोबाइल-9810243966

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