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Thursday, November 25, 2010

हर पंक्ति में व्यंग्य है


आदरणीय नीरवजी,
पंचायती राज व्यवस्था के समकीलीन कार्यान्वयन पर आपने सटीक और तेजीबी टिप्पणियों के साथ आलेख तैयार किया है। आप ने व्यवस्था की काफी कलई खोली है। आपके लेख की तो हर पंक्ति में व्यंग्य है मगर मुझे इन पंक्तियों ने काफी गुदगुदाया...
जहां पांच नर या नारी मिले पंचायत शुरू। औपचारिक पंचायत में तो एक ही सरपंच होता है, मगर इस पंचायत में हर सदस्य सरपंच की हैसियत रखता है। कोई किसी से कम नहीं। सब बराबर। खालिस समाजवादी व्यवस्था। जहां चाही,जब चाही पंचायत बैठा दी। और जब चाही उठा दी। पंचायत भी इस उट्ठक-बैठक में कभी उज्र नहीं करती। बड़ी पोर्टेबल होती है,यह पंचायत। और बड़ी फुर्तीली भी। इधर समस्या आई और उधर फैसला। कभी-कभी तो मुद्दे को आने में देर हो जाती है,फैसला पहले ही हो जाता है। मुद्दा ही समस्या है। और इसके साथ समस्या यही है कि ये समस्या कभी टाइम पर नहीं आती। जब चाहो तो नहीं आएगी। और जब उसका मूड होगा तो सीना तानकर बिन बुलाए आ जाएगी। बड़ी स्वेच्छाचारी हो गई हैं-समस्याएं।बिल्कुल आजकल की नदियों की तरह। जो कभी भी दो गांव के बीच आकर पसर जाएगी। आदमी न इधर जा सके और न उधर का आदमी इधर आ सके। जब चाहा उफन गई। आ गई बाढ़। जिस नदी की बदौलत खेत पनपते हैं, उसी नदी की बदौलत हर साल न जाने कितने खेत खेत रहते हैं। इस नदी की मनमानी से। और मज़ा देखिए कि पच्चीस-तीस साल में जैसे-तैसे हमारी सरकार नदी पर पुल बनाती है,पुल बनाते ही नदी रास्ता बदल देती है। या सूखकर लापता हो जाती है। एक होड़-सी लग गई है,नदियों और सरकार के बीच। इधर सरकार ने पुल बनाया उधर फटाक से नदी सूखी। खूब प्रगति हो रही है। धड़ाधड़ पुल बन रहे हैं,फटाफट नदियां सूख रही हैं। देशवासी परेशान हैं सोचकर कि चलो पानी का तो कुछ नहीं बाजार से खरीद लेंगे,मगर नदियां यूं ही सूखती रहीं तो हम शहरभर का कचरा और कारखानों की गंदगी कहां डालेंगे. पवित्र नदियां सूख जाएंगी तो देवी-देवताओं का विसर्जन कहां करेंगे। हमारे बिहारी भाई छठ कहां मनाएंगे। नदियां बिल्कुल समस्याओं की तरह स्वेच्छाचारी हो गई हैं। शायद पंचायती राज से स्थिति कुछ नियंत्रण में आए। सरकार यही मानती है कि पंचायतीराज के सामने समस्याएं ऐसे ही थऱथऱाएंगी-जैसे ओझा
तांत्रिक के आगे कोई चुड़ैल। आपको बधाई
ओमप्रकाश चांडाल
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