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Friday, November 19, 2010

मशहूर कलाप्रेमी

लो एक और बुकिंग हो गयी
लो देखिए गाजे-बाजे के साथ भरत के हंस सरोवर में। अब तो लोक मंगल की रंगत ही बदल गयी। लोक मंगल एकार्थी नहीं अनेकार्थी है। नहीं, मैं तो यूँ कहूँगा कि यह अनेकार्थी नहीं अनंतार्थी हो गया है जिसका समझना अति दुर्लभ है। जहाँ नीरव निःशब्द होकर भी शब्दों के बैंड, भावों की ध्वनि और रसों की तरंग में हँसते, मुस्कराते, टहलते, मटकते, नांचते, गाते , बैंड पर अँगुलियों से ठिठोलियाँ करते हुए कहीं पद्य में, कहीं गद्य में, कहीं व्यंग्य में , कहीं हास्य-परिहास्य में, अनंत ध्वनियों के अनंतलोक में मंजू, मधु, नीलम, दया, प्रेम-लता की निर्दोष टहनियों पर योगी, जगदीश, अरविन्द, गोपाल, अशोक , रजनी, हीरा, मणि, वेदी यानी द्विवेदी, त्रिवेदीऔर तो और चतुर्वेदी , हंस-परमहंस के ढ़ोल तासों के साथ अपनी आत्मजीय सृजन -मनन की ध्वनि में सराबोर होकर अपनी मस्तानी थिरकन में मस्त समुद्रीय लहरों के चबूतरे पर मलयानिल की सहज मंद-मंद पगपंसुरी में छनक-छनक , नवरस की रागिनी में लोक मंगल का कलश सिर रखकर देवठान की एकादशी पर अनसूझों को सुझाकर सबका बैंड बजाते दीखे। उसके बैंड मास्टर/ उस्ताद हैं पंडित सुरेश नीरव , मशहूर कलाप्रेमी। आप भी अपना बैंड बजबाइए। बुकिंग का हाउस फुल होने वाला है, जल्दी कीजिए, लीजिए उनका मो० न० मैं दिए देता हूँ -लिखिए -९८१०२४३९६६। अच्छा, भूल मत जाना। हरे हाँ, बता देना, न० हंस ने दिया था। कुछ पैसे कम कर लेंगे। जय लोक मंगल।
भगवान सिंह हंस
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