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Saturday, December 4, 2010

सर पे तेल चमेली का, सौदा करे सहेली का

आदरणीय नीरव जी,

समस्त सृष्टि की संवेदना आपको समर्पित करते हुए अत्यन्त हर्ष की अनुभूति हो रही है। आपने जो मंच प्रदान किया है उसके योग्य तो नहीं हूँ। देश के महान मनिषियों के बीच जिस तरह आपने मुझे प्रतिष्ठापित किया है, अभी उसकी योग्यता तो नहीं है मुझमें, परन्तु इतना अवश्य कहता हूँ कि मैं जो कुछ भी लिख सकुंगा आप तक सदैव पहुँचता रहेगा। आपने मुझे कवि, व्यंगकार और पत्रकार जैसी पद्वियों से नवाजा है उसके लिए ध्न्यवाद। परन्तु भारत माता की शपथ खा कर कहता हूँ कि मैं आम आदमी था, आम आदमी हूँ और आम आदमी हमेशा ही रहना चाहता हूँ। आपका आर्शिवाद रहा तो सदैव ही आम आदमी की तरह सत्ता और समाज के समक्ष अपनी बातों को उठाता रहूँगा।
कुछ लिखा है, भेज रहा हूँ पढ़ने के पश्चात उचित मार्गदर्शन करिये, ध्न्यवाद । अभिषेक मानव

सर पे तेल चमेली का, सौदा करे सहेली का

देवराज इन्द्र अपने कुकृत्यो की बदौलत भारत में एक गरीब कवि के घर उत्पन्न हो गए। मँा बाप ने नामकरण कर इनका नाम निरेश रख दिया। मनुष्य का तन जरूर मिला पर मनुष्यता न मिली बेचारे को। सबसे ज्यादा चिढ़ थी उन्हें संवेदनशील लोगों से। किसी का अच्छा उन्हें फूटी आंखों भी नही सुहाता। स्वर्ग के देवताओं में कभी-कभी इनकी दशा पर दया आ जाती । वो देवाधिदेव महादेव के पास जाकर इन्द्र की वापसी के लिए गिड़गिड़ाते रहते। एक दिन महादेव ने कहा, जाओ स्वर्ग के देवताओं वापस जाओ, इन्द्र की समस्या का निदान होगा परन्तु अभी और प्रतीक्षा करनी होगी। जब मैं, मानव रूप में भारत की राष्ट्रीय मीडिया में आम आदमी के तरह से संघर्ष करूंगा, उसी दौरान मैं इन्द्र के अहंकार का नाश कर उसे मनुष्य बनाउफंगा तत्पश्चात पुनः उसे देवत्व की प्राप्ति होगी। इतना कह कर महादेव अर्न्तध्यान हो गये! उन्होंने अपनी दृष्टि इन्द्र पर गड़ा दी । देखा तो इन्द्र बड़े घरों मे लोगों की नकल करने में इस तरह मस्त हैं कि मँा बाप को पीटते रहते हैं और सिर्फ गाली देते रहते हैं। गांव की युवतियों को डेटिंग पर ले जाना चाहते हैं, परन्तु युवतियां इन्हें घास भी नहीं डालतीं। बेचारे कुत्तों की तरह जीने को विवश थे इन्द्र ! यह सब चलता रहा। अपने नाम से इन्हें प्रेम था जबकि दूसरों को पीठ पीछे गाली देते। उन्हें अयोग्य ठहराते, अपनी इच्छा उन पर थोंपते-थोंप नहीं पाते तो शराब के नशे में दूसरों की मंा बहन करते। इन्हें सबसे ज्यादा चिढ़ भी मानव से ही थी। मानव शब्द से इतने बेचैन हो जाते कि इनकी पीड़ा दसवें आसमान तक पहुंच जाती। गाँव की गलियों में लात जूता खाते हुए बड़े हुए। चेहरे से सुन्दर थे। पिता जी ने किसी का पैर पकड़कर उनको मास्टरी दिलवा दी, चौथी कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई। उसे भी ठीक ढंग से निभा पाने में सक्षम नहीं थे निरेश। किसी तरह पुस्तक पढ़ कर एक आध लोगों से पूछ पाछ कर वेतन का जुगाड़ करने भर का कमा लेते थे। उसी दौरान कुछ नेताओं के सर्म्पक में आ गये। निरेश। उन दिनों एक पार्टी का बड़ा बोल बाला था। धीरे-धीरे सुखों को प्राप्त करने की होड़ ने उनको तलवा चाटना सीखा दिया और साथ में पेटीकोट के खटमल तो पैदाइशी थे ही । देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका में नौकरी मिल गयी। अब क्या था? गध्ेा का कॅान्फिडेंस बड़ा, गधे की हैंको हैंको की गर्जना को कुछ लोग भयवश विद्वता कहने लगे। गधा आतंकी हो गया। समस्त मानवजाति को पीड़ित करने लगे बालक निरेश! अब देवाधिदेव महादेव से निरेश की उदण्डता देखी नहीं गई। उन्होंने निरेश के हृदय में अत्यधिक धन प्राप्त करने की तमन्ना पैदा कर दी। बालक निरेश धन कमाने हेतु येन केन प्रकारेण संघर्ष करने लगे। निरेश कविसम्मेलनों के आयोजक बन गए। तरह-तरह के कवि और कवयित्रियों से घिर गए निरेश। घमण्ड अखण्ड हो अनन्त में विलीन हो गया । पैसे वालों की डिमाण्ड पर निरेश सहेलियों का भी सौदा करने लगे। पहले कवयित्रियों की अन्तरात्मा का पाश्चातिकरण करते, फिर अपने उपदेशों के जरिये उनकी अन्तरात्मा में अज्ञानता का दीपक जलाकर उन्हें यह समझा देते कि जीवन में गलत कुछ नहीं होता है । इसलिये संसार से युद्ध करने के लिए अपने सौन्दर्यबल को तलवार की तरह इस्तेमाल करो। कई कवयित्रियां रेडियो और दूरदर्शन का जीर्णोधार करने लगीं। अधिकारी भी खुश, जनता भी खुश, कवयित्रि भी खुश और बालक निरेश भी धन प्राप्त कर खुश। इस प्रकार की तुष्टीकरण की नीति पर अमादा हो चले बालक निरेश यशस्वी बन गए। अपने सर पे चमेली का तेल लगाते और सहेलियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि करते जाते। महादेव धरती पर आ गए। उनके लिए यहंा सिफ्रट होने में बड़ी दिक्कत महसूस होने लगी। आगमन का उद्देश्य तो सिर्फ अन्तर्यामी प्रभु को ही मालूम था। लोग उन्हें निकम्मा कहते बेरोजगार कहते और भी तरह-तरह के उपनामें से संबोधित करते। प्रभु ने कहना शुरू किया कि मैं मानव हूं। लोग विरोध करते और कहते मानव तो सभी हैं । खैर इन सब बातों का उन पर कोई असर नहीं होता। उधर बालक निरेश अपनी विद्वता के घमण्ड पर नाज करते। साथ में अपने अहंकार को और भी पालने पोसने में भूल गए थे कि वौ कौन हैं? कहां हैं? और क्यों हैं? सबकुछ भूलकर बस धन की माला का जाप करते-करते उन्होंने इतने पाप कर डाले कि आगामी 2000 वर्षों तक के लिए स्वर्ग का रास्ता उनके लिए बन्द हो गया था। नारद ने महादेव से कहा प्रभु और विलम्ब न करें, नहीं तो इन्द्र हमेशा-हमेशा के लिए बन्दर बन जायेंगे और स्वर्ग का द्वार ही उनके लिए बन्द हो जायेगा। महादेव ने बेरोजगार मानव के रूप में निरेश का दरवाजा खटखटाया। सन्त्री ने दरवाजा खोला, पूछा कौन? महादेव ने कहा मानव ! सन्त्री हंसने लगा अबे तू साले दो टके का बेरोजगार मानव है और हम सब क्या दानव हैं? यही रुक मैं साहब से पूछकर आता हूं तब मकान के भीतर पैर रखियो नहीं तो...........! महादेव इन्तजार करने लगे। निरेश ने नौकर से कहलवाया कि कह दो 8 रोज के बाद आये। अभी वह अमेरिका में एक कविसम्मेलन कराने में व्यस्त हैं। महादेव क्रोधित हो सन्त्री को धक्का देकर, भीतर दाखिल हो गए। पूरे भवन में कोहराम मच गया। सुरेश ने अपने अहंकार में कहा! अबे तेरे जैसे मानव यहा रोज मेरे तलवे चाटते हैं। तेरी इतनी हिम्मत कि तू बगैर एप्वाईन्टमेन्ट के मिलने चला आया। महादेव ने कहा, इतना इठलाता क्यों है बे, औरतों के दलाल ! निरेश सकपका गये। अबे तूझे कैसे मालूम ! महादेव ने कहा मैं देशद्रोही डाट काम का मुख्य संवाददाता हूं। मुझसे हेकड़ी दिखायेगा तो नंगा कर दूंगा साले। तेरे धन कमाने का एक-एक शँाट है मेरे पास ! सहेलियों का सौदा करके जो तू चमेली का तेल सर पे लगा के देवता बनते फिर रहा है, तुझे तेरी औकात पे अभी लाउफं क्या बे? निरेश गिड़गिड़ाने लगे। मुझे माफ कर दीजिए मानव जी । मैंने आपके प्रभाव को नहीं समझा । आप चाहंे तो मेरी पत्रिका में संपादक बन जायें । मुझे माफ करें । तब तक महादेव ने निरेश को अपना असली रूप दिखा दिया। निरेश प्रभु के चरण पकड़कर फूट-फूट कर रोने लगे। निरेश ने कहा! प्रभु स्वर्ग मुझे दे दीजिए। मैं यहां नहीं रहना चाहता। भगवान महादेव ने कहा अभी तुझे 2000, वर्ष तक और घोर तपस्या करनी पड़ेगी । सौदा करे सहेली का, सर पर तेल चमेली का । चला है स्वर्ग मांगने। निरेश प्रफस्टेडिया गए हैं, आजकल केवल भड़ास निकाल रहे हैं, अभी 2000, वर्ष और धरती पर ही रहेंगे। इतना देखते-देखते, लिखते-लिखते मानव जी अदृश्य हो गए।

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