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Saturday, December 11, 2010

वाराणसी कांड पर कविता

भोले भाले लोग गंगा आरती में तल्लीन,
पलकों को मूंदे किये मन में विधाता को,
धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य लिए श्रद्धालु,
दे रहे थे हाथ जोड़े धन्यवाद् माता को,

ठीक उसी क्षण किया असुरों नें उत्पात,
सुरसरी, गंगा मैया रक्त से नहा गयीं,
दुष्ट दानवों की पापमयी ये कुटिल लीला,
एक छोटी बिटिया को संग में बहा गयी,

कौन सी जिहाद, कैसी कौम, कैसा इस्लाम,
तुमको सिखाता भोले मासूमों को मारना,
पहले तो जा के इंसान बन दिखलाओ,
फिर हो सके तो तुम कोई धर्म धारना,

'माय हार्ट गोज़ आउट' शब्दों में बोल कर,
समिति गठित कर आप मत छूटिये,
बांसुरी बजाना छोड़ मेरे मनमोहनजी,
'सत श्री अकाल' बोल दुश्मनों पे टूटिये.

भारत की पुण्य भूमि क्षमाशील है परन्तु,
शिशुपाल का हर एक पाप तुल जाएगा,
दोज़ख में भी न छिप कर रह पाओगे जो,
बाबा विश्वनाथ का त्रिनेत्र खुल जाएगा.
प्रस्तुतिःप्रदीप शुक्ला
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