Search This Blog

Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Saturday, January 28, 2012

जिनके हाथों में सिर्फ पंक



कितनी कुंठा, कितना विषाद ?
मन में उसके कितना प्रमाद !
गाथाएँ गढ़ता मनगढ़ंत,
यद्यपि बनता है बड़ा संत
जब निहित स्वार्थ तब अनुगामी,
जब स्वार्थ सिद्ध तो संग्रामी.
कैसा दुहरा पाया चरित्र ?
है कभी शत्रु है कभी मित्र.
यह नहीं जानता है गज पर 
श्वानों का कब पड़ता प्रभाव ?
यह व्यर्थ भूँकना है उसका,
है वृथा सखे, उसका दुराव.
क्षण भंगुर जीवन को साथी !
ऐसे बर्बाद नहीं करते.
जिनके हाथों में सिर्फ पंक,
हम उनको याद नहीं करते.
फिर भी उर में यह चाह सदा,
वह करे प्रगति, पाए सुयोग,
क्षमताओं का उपयोग करे
कुत्सित मन हो जाए निरोग.

Thursday, January 5, 2012

"स्त्री होकर सवाल करती है!" : "कविता समय"





"स्‍त्री होकर सवाल करती है....!"
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी 


यदि आप जयपुर में हैं तो अवश्य सम्मिलित हों .....

आप सादर आमंत्रित हैं ...............................


"स्‍त्री होकर सवाल करती है....!"
(127 रचनाकारों की स्‍त्री विषयक कविताओं का संग्रह)


प्रकाशक - बोधि प्रकाशन (जिन्होंने प्रत्येक पुस्तक का दाम 100/- मात्र की अपनी प्रतिबद्धता के कारण नया कीर्तिमान स्थापित कर एक नई परंपरा को जन्म दिया व हिन्दी पुस्तकों के क्षेत्र में नई क्रान्ति के बीज रोप कर सर्वत्र ख्याति पाई है )

संपादक - डॉ लक्ष्‍मी शर्मा

पेपरबैक/प्रथम संस्‍करण - जनवरी 2012

पृष्‍ठ  - 384

मूल्‍य - 100 रुपये मात्र

लोकार्पण  - दिनांक 8 जनवरी 2012, रविवार, सुबह 11.45, ''कविता समय'' कार्यक्रम के कविता पाठ सत्र में

स्‍थान: राजस्‍थान हिन्‍दी ग्रंथ अकादमी, झालाना सांस्‍थानिक क्षेत्र, जयपुर


मुझे हर्ष है कि मेरी कविताएँ भी इस संकलन में सम्मिलित हैं।



384 पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्‍य 100 रुपये मात्र है (डाक से मँगाने पर पैकेजिंग एवं रजिस्‍टर्ड बुकपोस्‍ट के 50 रुपये अतिरिक्‍त)।



 इसे Bodhi Prakashan ने प्रकाशित किया है। 

उनके "बोधि प्रकाशन, एफ 77, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 302006 राजस्‍थान। संपर्क दूरभाष : 099503 30101, 08290034632 (अशोक) " के पते से इसे क्रय किया जा सकता है। 

जो भी मित्र इस पुस्तक की समीक्षा/ पुस्तक चर्चा / रिव्यू इत्यादि लिखें, उनसे निवेदन है कि कृपया उसे Maya Mrig जी, बोधि प्रकाशन तथा मुझसे + अन्य सम्मिलित लेखकों से अवश्य बाँटें/ सूचित करें।

कविता समय कार्यक्रम की अद्यतन जानकारियों के लिए देखें -  यह लिंक 

Friday, December 30, 2011

भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन : `युद्धरत आम आदमी' व 'हाशिए उलाँघती स्त्री'


भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन :  `युद्धरत आम आदमी' व 'हाशिए उलाँघती स्त्री' 
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी 


वर्ष 2004 में  रमणिका फ़ाउंडेशन की पत्रिका "युद्धरत आम आदमी" के दो विशेषांकों की योजना रमणिका गुप्ता जी ने बनाई थी। एक विशेषांक भारतीय भाषाओं की स्त्री कविता का और दूसरा स्त्री लेखन (गद्यभाग) का। 


यह निस्संदेह एक बड़ी विशाल व श्रमसाध्य योजना थी। रमणिका दी' अपने जुझारूपन, कर्मठता  और अतीव उत्साह के लिए भी अपने आप में विशिष्ट उदाहरण हैं। 2008 में उन्हें आए हृदयाघात के दिनों में उन्होने स्वयं अस्पताल से ही फोन कर के मुझे अपनी रचनाएँ इन विशेषांकों के लिए भेजने को कहा। मैंने उनके जीवट और आत्मीय स्नेह के चलते इसी उद्देश्य से एक नई  (काफी लंबी ) कहानी लिखी और `सहेली होने का पाप' शीर्षक से सितंबर 2008 में उन्हें  भेज दी। (गत दिनों इस कहानी का नाम बदल कर केवल `पाप' कर दिया है)


इस बीच वर्ष 2009 के दिसंबर माह में भारत जाने पर मैं लंबी अवधि तक (लगभग 15 दिन ) रमणिका जी के आवास पर ही रुकी। उन दिनों "हाशिये उलाँघती स्त्री" के पद्य भाग के दो खंडों में होने की योजना पर कार्य चल रहा था। रमणिका जी रात-रात भर बैठ कर प्रूफ देखा करती थीं और विविध भारतीय भाषाओं की हिन्दी में अनूदित हो कर आई कविताओं के पुनर्लेखन की भी आवश्यकता पड़ा करती थी ताकि उन्हें हिन्दी के मुहावरे में सही सही ढाला जा सके। प्राप्त कविताओं में से कुछ कविताओं को उन दिनों रमणिका जी के साथ बैठ कर नए रूप में ढाला, ढलते देखा। 


अंततः `युद्धरत आम आदमी' का  `हाशिए उलाँघती स्त्री' नामक  भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन (2 अंकों में) तैयार हो कर आ गया।  26 मार्च 2011 को इनका लोकार्पण  साहित्य अकादेमी, रमणिका फाउण्डेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय कार्यक्रम में भव्य तरीके से सम्पन्न हुआ। 


मेरी लेखकीय प्रतियाँ भारत के हमारे डाक पते पर भिजवा दी गईं। जुलाई में  उनकी स्कैन प्रति प्राप्त होने पर उन्हें देख पाने का सुयोग मिला। 


`हाशिये उलाँघती स्त्री' के इस भास्वर संकलन का पहला खंड हिन्दी कविताओं का है व दूसरा खंड हिन्दी में अनूदित भारतीय भाषाओं की कविताओं का।  

दोनों अंकों की संपादक हैं रमणिका गुप्ता जी और अतिथि संपादक हैं  कवयित्री `अनामिका' । 


विशेषांक (प्रथम अंक) में मेरी जो कविताएँ सम्मिलित हैं, वे हैं -


१. बच्चियो
२. रुमालों पर 
३. मैं कुछ नहीं ..... 
४. मैंने दीवारों से पूछा 
५. औरतें डरती हैं
६. गौरैया

 पढ़ते समय कृपया ध्यान रखें कि मेरी इन कविताओं के प्रकाशन में कुछ बहुत भारी त्रुटियाँ रह गई हैं। यथा, पहली वाली कविता में एक अन्य कविता का अंश जुड़ा हुआ है (आधी एक व आधी दूसरी मिला कर ) और अंतिम कविता में भी कुछ ऐसी ही चूक आ गई है। टायपिंग/प्रूफ और वर्तनी की त्रुटियाँ छूट गई हैं।   अस्तु ! इतनी बड़ी योजना में अनेक लोगों व लंबे समय तक चली प्रक्रिया के चलते ऐसी त्रुटियाँ विशेष महत्व नहीं रखतीं।  इन कविताओं का सही पाठ वागर्थ पर अथवा कविताकोश में संकलित मेरे संकलन पर पढ़ा जा सकता है। :) 

-(डॉ.)  कविता वाचक्नवी







आयोजन के पश्चात रमणिका फाउंडेशन एवं साहित्य अकादेमी द्वारा 26 मार्च 2011 को जारी समाचार की प्रति - 


"राजधानी दिल्ली में पहली बार 25 भिन्न भारतीय भाषाओं की स्त्रीवादी कवयित्रियों की अनुगूंज सुनाई दी। स्त्री मुक्ति और स्त्री सौंदर्य की परिभाषा को नये सिरे से गढ़ते हुए महिला कवियों ने एकमत से कहा कि अब स्त्रीवादी लेखन को लेकर आनंद का समय आया है। मौका था साहित्य अकादेमी, रमणिका फाउण्डेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ के संयुक्त तत्वावधान में ‘हाशिये उलाँघती स्त्री’ कविता-पाठ पर एक दिवसीय कार्यक्रम का। 

26 मार्च को हुए इस कार्यक्रम ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी एक सांझे मंच की तरह भारत की तमाम भाषाओं के साहित्य के तौर पर मिलाने का काम कर रहा है। रमणिका फाउण्डेशन के साथ साहित्य अकादमी ने और भी काम किया है। उन्होंने बताया कि रमणिका फाउंडेशन द्वारा तैयार आदिवासी अंक को देख कर एक आदिवासी ने कहा कि ऐसा कार्य तो हमने आज तक नहीं देखा। उन्होंने रमणिका फाउंडेशन के कार्य को रेखंकित करते हुए कहा कि इस आयोजन के जरिये उन्होंने एक इतिहास रच दिया है।

रमणिका गुप्ता अध्यक्ष रमणिका फाउण्डेशन एवं संपादक ‘युद्धरत आम आदमी’ के आरंभिक भाषण में ें ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ विषयक गोष्ठी और इसी नाम से इसी विषय पर प्रकाशित युद्धरत आम आदमी के विशेषांक की स्त्री-दिवस के उपलक्ष्य में विशेष चर्चा करते हुए स्त्री मुक्ति की अवधारणा के विकास के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि कविता में स्त्री मुक्ति की अवधारणा के बीज हिन्दी में मीरा, पंजाबी में पारो परेमन और में कन्नड़ की अक्कमहा देवी (अक्कअम्मा) तक जाते है। इस संकलन में हमने 334 स्त्री मुक्ति पर लिखने वाली कवयित्रियों को शामिल किया है जिनमें 127 हिन्दी की हैं और 207 हिन्दीतर भाषाओं की। इन सभी भिन्न-भिन्न भाषी कविताओं में स्त्री मुक्ति का एक सुर गूंजा है, भले उसका स्वर, लय या धुन भिन्न-भिन्न हो। अपने आरंभिक वक्तव्य में रमणिका गुप्ता ने विशेषांक की तैयारी के दौरान आई चुनौतियों के बारे में बताया और कहा कि उनकी कोशिश स्त्रिायों को पुरुष के खिलाफ खड़ा करना नहीं है। स्त्री की मुक्ति का अर्थ पुरुष से मुक्त होना लगा लिया जाता है, देह की मुक्ति का आशय यौनता से लगाया जाता है जबकि हमारा आशय मानसिक तथा दैहिक स्तर पर अपने निर्णय लेने के अधिकार से है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्त्री-मुक्ति के आंदोलन का मतलब यह नहीं कि इसमें सिर्फ महिलाएं ही शामिल हों बल्कि यह पुरुषवादी दृष्टि से सोचने-समझने की एक खास मानसिकता में कैद हो चुके समाज को मुक्त करने को आंदोलन है, स्त्री-पुरुष को समाज में समान दर्जा दिलाने की मुहिम है। जाहिर है मुक्ति के इस आंदोलन में स्त्री-पुरुष दोनों की साझी जरूरत है। उन्होंने कहा कि स्त्रियों को पुरुष-दृष्टि से सौंदर्य की परिभाषा गढ़ने की जगह अपनी सौंदर्य-दृष्टि विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि एक मध्यवर्गीय कामगार महिला, एक मजदूर महिला और एक अभिजात वर्ग की महिला के लिए स्त्री-मुक्ति की अवधारणाएं अलग-अलग हैं। उनके सौंदर्य की कसौटियां भी अलग-अलग हैं। हो सकता है कि एक अभिनेत्री के लिए कमनीय देहयष्टि की जरूरत हो, पर एक मजदूर महिला के लिए स्वस्थ और हट्टे-कट्टे शरीर की आवश्यकता है। इसलिए महिलाओं को भी सौंदर्य-शास्त्रा की पुरुषवादी जकड़न और बाजारवादी दृष्टि से मुक्त होने की जरूरत है, जिसका वे चाहे-अनचाहे शिकार हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि स्त्रियों को अपने सौंदर्य की कसौटी खुद गढ़ने की जरूरत है। उन्हें पुरुषों के लिए नहीं, अपने लिए सुंदर दिखने की जरूरत है। सौंदर्य के चालू मुहावरों के हिसाब से नहीं वरन अपने जरूरत के मुताबिक अपने सौंदर्य की नयी परिभाषा गढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यहां असल लड़ाई निर्णय के अधिकार और समानता की है जिससे यह पुरुषवादी समाज हर क्षण आतंकित रहता है। गुजरात की कवयित्री योगिनी श्क्ल की कविता की ओर ध्यान खींचते हुए उन्होंने कहा कि हमारे यहां श्रृंगार की कविताएं खूब होती हैं। विडंबना देखिये कि स्त्रियों को रोशनी कहते हैं और उनसे उनका सूरज छीन लिया जाता है। उन्होंने कहा कि आकर्षण सिर्फ सूरत का नहीं, सीरत का भी होता है। उन्होंने बताया कि पूर्वोत्तर में सूर्य को स्त्राी माना जाता हैµयानी शक्ति का प्रतीक स्त्री है। यह दो संस्कृतियों व मानसिकता के सामाजिक ढांचे में एक महत्त्वपूर्ण फर्क को रेखांकित करता है। 

समारोह के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध चिंतक भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर के सचिव तथा रमणिका फाउण्डेशन के ट्रस्टी सदस्य गणेश नारायण देवी ने युद्धरत आम आदमी पत्रिका के विशेषांक हाशिये उलांघती स्त्री का विमोचन किया और गोष्ठी के उद्घाटन व्याख्यान में कहा कि शिक्षा और चिकित्सा के स्तर पर केवल गरीब स्त्रिायों की ही नहीं सम्पन्न स्त्रियों की भी उपेक्षा की जाती है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी देशों में तो उन्नीसवीं सदी के मध्य तक महिलाओं को लेखक ही नहीं माना गया। हमारे यहां स्थिति थोड़ी भिन्न थी। हमारे यहां मीरा को भले जहर पीना पड़ा था लेकिन उनकी कविताएं घर-घर पहुंचीं। उन्होंने कहा कि अब स्त्रियों की दशा में थोड़ा सुधार आया है और देश में शिखर के संवैधानिक पदों पर महिलाएं जरूर आ गयी हैं पर आम महिलाओं की हालत में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है। अखबार की खबरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं और भी असुरक्षित होती जा रही हैं। एक तरफ देश का विकास हो रहा है और इस इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास का बोझ जैसे महिलाओं के सिर पर ही डाल दिया गया है। उन्होंने ‘हाशिये उलांघती स्त्राी’ विशेषांक के प्रकाशन को तमाम निराशाओं के बीच अंधेरे में उम्मीद की चमक बिखेरने वाला ऐतिहासिक घटना कहा। उन्होंने आगे कहा कि स्त्री-स्वर का इस स्वरूप में आना एक नयां इतिहास गढ़ना है। आशीष नंदी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि गांधीजी ने सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और नमक सत्याग्रह का तरीका स्त्रियों से ही ग्रहण किया। उन्होंने साहित्य अकादमी से अपेक्षा की कि इन दोनों खण्डों का सम्मिलित भाषाओं में भी अनुवाद किया जाना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात कवि तथा ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि साहित्य अपने अंधेरों के समक्ष खड़ा होने की हिम्मत जुटाता है, उससे भागता नहीं है और न ही उसे छुपाने की कोशिश करता है। स्त्रियों का यह लेखन साहित्य में लोकतंत्रा को मजबूत स्थिति प्रदान करता है। इस संग्रह में संग्रहित कविताओं को उन्होंने नयी दुस्साहसिकता का उपक्रम कहा। रमणिका गुप्ता की बात की ताईद करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य का सृजन करने वाली स्त्रियों को पुरुषों की स्थापित सौंदर्य दृष्टि से अलग हट कर अपनी सौंदर्य दृष्टि गढ़नी चाहिए। साथ ही यह अपेक्षा भी दर्ज की कि स्त्रियों के साहित्य से एक नये तरह का कर्म-सौंदर्य निकलना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्त्रियां अपने लेखन में बहुत हद तक सामाजिकता की बात करती हैं लेकिन उसमें उनकी अंतरंगता गायब है। 

प्रसिद्ध कवयित्री एवं युद्धरत आम आदमी के ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ के विशेष अंक की अतिथि संपादक अनामिका ने अपने बीज भाषण में बताया इस संकलन में संकलिता कविताएं एफ.आई.आर. की तरह उपस्थित हैं। यह स्त्री आंदोलन ऐसा आंदोलन है जिसने एक बूंद भी खून नहीं बहाया और चहुंमुखी विस्तारित हो रहा है। स्त्रियों को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती हैं ये कविताएं नए मानदंड, नए प्रतिमान गढ़ती हैं ये कविताएं। उन्होंने कहा कि स्त्री चेतना की बेल कैद की दीवारों के ऊपर चढ़ कर आजादी का अनुभव करने लगी हैं। उन्होंने कहा कि यह बेल अब इस कदर ऊपर चढ़ गयी है कि हमें अब इनसे आनंद फल पाने की उम्मीद बांधनी चाहिए। 

मलयालम की आलोचक के. वनजा ने दक्षिण भारत में स्त्री मुक्ति की काव्यधारा के विकास पर अपना आलेख पढ़ा। युद्धरत आम आदमी की सहयोगी संपादक दलित आलोचक एवं कवयित्री हेमलता महिश्वर ने उत्तर भारत की काव्य धारा में स्त्री मुक्ति के अंकुरों के पेड़ बनने तक की विकास यात्रा का ब्योरा देते हुए बताया कि समस्त कवयित्रियों के स्वर में एकसूत्राता दृष्टव्य होती है। यह एकसूत्राता स्वयं के प्रति निष्ठुर समाज के प्रत्येक अत्याचार का विरोध अभिधा, व्यंजना एवं लक्षणा में व्यक्त करती हैं। यह पहला अवसर था जब बाइस विभिन्न भारतीय भाषाओं की स्त्रीवादी कवयित्रियां, दिल्ली में एक मंच पर उपस्थित हुईं। इस सत्रा में के. वनजा की ‘चित्रा मुद्गलः एक मूल्यांकन’ नामक आलोचनात्मक पुस्तक का विमोचन अशोक वाजपेयी और गणेश देवी ने किया। 

उद्घाटन सत्रा में सलमा, प्रतिभा नंदकुमार, ग्रेस कुजूर ने काव्य पाठ किया। तीसरे सत्रा में दीप्ति नवल का शामिल होना कार्यक्रम का अतिरिक्त आकर्षण था। कविता-पाठ के तीन सत्रों में अपनी कविताओं से श्रोताओं को आंदोलित करने वालों में प्रमुख थी बी. संध्या (मलयालम), कुट्टी रेवती (तमिल), शाहजहाना (तेलुगू) सोमा बंद्योपाध्याय (बांगला), मीनाक्षी गोस्वामी बरठाकुर (असमिया), जोगमाया चकमा (चकमाµत्रिपुरा) हीरा बनसोडे (मराठी), उषा उपाध्याय (गुजराती), दाँङी चाँडथू (मिजो), लाइरेनलाकपम (पैतैµमणिपुरी), निरुपमा दत्त(पंजाबी), शुभा, सविता सिंह, रंजना जायसवाल, अनिता भारती (हिंदी), विभा रानी (मैथिली), निर्मला पुतुल (संथाली), सरिता बड़ाइक (नगपुरिया झारखंड), दरख़्शां अंदराबी (कश्मीरी), तरन्नुम रियाज (उर्दू)श्, दीप्ति नवल, लक्ष्मी कन्नन (अंग्रेजी)। इस आयोजन में हिन्दी की तीन, अंग्रेजी की दो, उर्दू, मराठी, गुजराती, पंजाबी, बांगला, ओड़िया, मिजो, चकमा, मणिपुरी-पैतै, असमिया, संथाली, नगपुरिया, कश्मीरी, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ भाषा की एक-एक, तमिल की दो। 

रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित ‘युद्धरत आम आदमी’ के ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ कविता अंक की अतिथि संपादक हैं अनामिका। सम्पादन सहयोग में हेमलता महिश्वर, कंचन शर्मा और उषा उपाध्याय, साॅलजी थॅमस, हरीश परमार हरप्रीत और विपिन चैधरी का नाम लिया गया!

भारतीय स्त्री कविता के इस भास्वर संकलन पर 2004 से काम शुरु हुआ। सात-आठ वर्षों के अथक संयुक्त श्रम का नतीजा है हिन्दी और हिन्दीतर कविताओं पर केन्द्रित ये दो भाग जिनका लोकार्पण इस अवसर पर गणेश नारायण देवी के हाथों हुआ। स्त्री-मुक्ति आंदोलन की चार पीढ़ियाँ भारतीय भाषाओं में अपनी सर्जना का प्रकाश कैसे फैला रही हैµ इसका जायजा यहाँ मिलता है।

इस अवसर पर रमणिकाजी की कहानी ‘नई मेनका’ का सजीव पाठ एवितोको की ओर से मुम्बई की विभा रानी ने किया। विभा रानी के नाटक ‘आओ तनिक प्रेम करें’ और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ पर मोहन राकेश अवार्ड 2005 मिला। उनके ब्लाॅग ‘छम्मकछल्लो कहिस’ पर 2009 में लाडली इंडिया अवार्ड मिला। कार्यक्रम के तीन सत्रों का कुशल संचालन अल्का सिन्हा, सुधीर सागर और पूनम तुषामड़ ने किया।"

Monday, July 4, 2011

समझदारी की कविता /कृष्ण कुमार मिश्र 'अचूक '


कवि कृष्ण कुमार मिश्र  'अचूक ' : आज है जन्मतिथि . 

भूख बेकारी की कविता लिख रहा हूँ , 
एक महामारी की कविता लिख रहा हूँ. 
जो बुढ़ापे में भी गारा ढो रही है , 
ऐसी महतारी की कविता लिख रहा हूँ .
गाँव जिसकी मिलकियत में सो रहे हैं , 
ऐसे पटवारी की कविता लिख रहा हूँ .
आदमी की जिन्दगी बेहतर बनेगी , 
मैं समझदारी की कविता लिख रहा हूँ . 
                              कवि कृष्ण कुमार मिश्र  'अचूक ' : 
जन्म ; 5 जुलाई , 1939 .पीलीभीत 
मंचों के सक्रिय हस्ताक्षर रहे .
 बच्चों के लिए भी बहुत रोचक पहेलियाँ , कविताएँ एवं कहानियां  लिखीं .
प्रकाशित पुस्तक : अक्षर ज्ञान , नव हास्य कुसुम 
                               आकस्मिक निधन :21 फरवरी 2010 , शाहजहांपुर (उ.प्र.)
===========

Wednesday, April 20, 2011

आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल

हर कोई ऑफिस अलग उद्देश्य से जाता है,
ऑफिस जाने का जीवन से गहरा नाता है!
कोई ऑफिस में अजीविका कमाने जाता है,
कोई वहां अपनी तृष्णा मिटाता है,
कोई ऑफिस में जाकर किस्से सुनाता है,
...बिना कुछ काम किये खुद को थका हुआ बताता है,
मगर जो भी ऑफिस जाता है,
वो ऑफिस को घर से ज्यादा प्यारा बताता है...।
गौरव सिंह
ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त
का प्यार चाहिए,
ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत मे
...किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,
कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब
कुछ,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,
उस दोस्त के चोट लगने पर हम
भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल
चाहिए,ष
संजय मेहता

Thursday, March 17, 2011

हॊली कॆ रंग,,राधा कॆ संग,,,,

हॊली कॆ रंग,,राधा कॆ संग,,,,
-------------------------------------------
राधा और कृष्ण मे अनबन हो गई है,और राधा जी कुछ षड़यंत्र रच रहीं है,,,
और बस यहीं से प्रसंग शुरू हॊता है,

कृष्ण कह रहे हैं,,,,,
आज हॊरी में, गुलाल भरे झॊरी में, तुम द्वार-द्वार, सखियां बुलाय रही हॊ !
मचले मन मॊर, उठे हिय में हिलोर, अंखियां चकॊरी काहे चुराय रही हॊ !!
कान में बॊल बॊल,मूक-मंत्र घॊल,पंकज कपोल नाग-भरनी भराय रही हॊ !
राधे ढ़िग जाय कहें कान्हा मुस्काय, करतार पै कछु करनी कराय रही हॊ !!१!

मन मे है चॊर,काहे तनी नाक तोर,"राज" कछु आज तू छुपाय रही है !
कमर दॊ घेर, कसे चुनरी गुरेर, नैन नचाइ रही हॊंठ क्यूं चबाय रही है !!
पिचकारी में रंग भरे मन में उमंग, नागफ़नी सी दबंग मुस्काय रही है !
चित्त चढ़ी भंग, नाचे अंग में अनंग, चाल ज्यॊं मतंग कहां जाय रही है !!२!!

अब राधा कह रहीं हैं,,,,,,,,,
चाल तेरी जान गई,तोहे पहचान गई, झूठे बहाना बनाना कान्हा छॊड़ दॆ !
तू है नंदलाला, मैं भी बृज की बाला, बाला-बाला बहलाना कान्हा छॊड़ दॆ !!
हॊरी है जाय ठिठॊली कहीं और कर,जॊरा-जॊरी आजमाना कान्हा छॊड़ दॆ !
छलिया नंदलाल करे काहे रे बबाल,मेरी गली आना जाना कान्हा छॊड़ दॆ !!३!!

अब कृष्ण की ऒर सॆ प्रतिक्रिया हुई,,,,,,,,
कृष्ण कन्हाई धाय पकरी कलाई, घबराई तब हाल बेहाल भये राधा के !
तन इंनकार करे मन इकरार, भूल तकरार के सब ख्याल गये राधा के !!
अँखियां सिकॊर चितचॊर कहे, जॊर-जॊर मलूंगा गुलाल गाल पै राधा के !
हाँथ, हाँथ छुओ गात ने गात जब, बिना गुलाल गाल लाल भये राधा कॆ !!४!!

राधा ने एक शर्त रख दी कृष्ण के सामने,,,,,
रंग डार रंग डार रॊम रॊंम रंग डार, तू जीतॊ कान्हा मैं हारी मान जाऊंगी !
जाना अनजाना भूलके बहाना तेरा, रूप का खजाना सरकारी मान जाऊंगी !!
प्रेम के पुजारी प्रेम की सौगंध है, तू निबाहे तॊ प्रेम- पुजारी मान जाऊंगी !
श्याम रंग छॊड़ दूजे रंग रंग मॊय, रंग-रसिया तेरी रंग-दारी मान जाऊंगी !!५!!

भर पिचकारी श्याम सराररा मारी, अंग-अंग राधे के सरबॊर भये रे !
सिसयानी,खिसयानी,सरमानी राधा, फ़ागुन में मचल मन मोर भये रे !!
कैसा रंग मोरे अंग डारयो छलिया,अंग-अंग शिथिल पोर-पोर भये रे !
मूरत सी ठाढ़ी राधा देखे श्याम कॊ, जैसे नैन राधा के चकोर भये रे !!६!!

बूंद-बूंद धरन पे गिरन लगे ज्यों, मोती गिरें टूट-टूट मणिमाला से !
उभय शिखर मध्य रंगधार यूं बहे, गंग-धार बहती ज्यों हिमाला से !!
गीले बसन में लिपटे नशीले अंग, गीलॊ बदन जरो जात ज्वाला से !
लाज की गाज गिरी राधा पे आज,झट झपट लिपट गई नंदलाला से !!७!!

श्याम वक्ष ज्यों बरगद वृक्ष भयो, राधिका लता बेल सी लिपटाय रही है !
राधिका के बाहुपास फ़से श्याम यूं, ज्यों बाघिन बछड़ा - खिलाय रही है !!
हांफ़ रही कांप रही न कछु भांप रही, उरग श्वांस धम्मन चलाय रही है !
अनुलोम-विलोम भयॊ श्वासो-श्वांस में, एक स्वर पी दूजॊ पिलाय रही है !!८!!
राजा बुंदेली

Wednesday, March 16, 2011

आज फिर ये ख्याल आया ,

कविता-
कई दिनों बाद
आज फिर ये ख्याल आया ,
एक अंत हीन
सफ़र को दिल फिर क्यों चाहा
एक ऐसी यात्रा पर
आपनी व्यथाओ पर अंकुश
क्यों नहीं लगा पाता
अपनी चीत्कार को
क्यों नहीं सह पाता
कई बार समझाया,
अपनी खुद की
व्यथा पर ,
अपनी ही नियत पर
मैंने कितने फैसले लिए
फिर भी
भावशून्य
आशंकित, मन
मोह की जंजीर,
थामे रुक - रुक जाता !
बीते समय को बंद मुठी में किये
आज खुद से नाराज़, हालात से खफा
ख्यालो की कब्र गाह पर
आज फिर सो - सो जाता !

---------------रविन्द्र शुक्ला

जो रो कर जग में आता है कविता

कविता-

कल्पनाओ के मंदिर में
सपनो का पुजारी
भावनाओ के कोमल पंखुड़ियों से
उम्मीदों के फूल खिलाता है
कोई भला क्या समझ सकता है
एक कवि हकीकत के धरातल पर
न जाने कितने कष्ट उठता है
पर अपनी आंसुओ में डूबी
गहरी मुस्कराहट से जाने कितनो को हँसता है
जो सामने तो मुस्कराता है
पर तन्हाई में आंसू बहाता है
कहाँ कोई कवि के ह्रदय की वेदना को
संवेदना दे पाता है
क्यों कोई कवि पागल कहलाता है
जो भावनाओ का बादल बन जाता है
वही कवि और कविता को समझ पाता है
हर कोई इतिहास दुहराता है
हर युग में कवि
समाज का दर्पण बन जाता है
जीवन का समर्पण कहलाता है
जो रो कर जग में आता है
पर हँसता हुआ योगी बन जाता है


अरविन्द योगी

मैं चाहता हूँ ,मैं तेरी हर बात में मिलूं......

उसने मेरी जिंदगी को यूँ मुकम्मल कर दिया
काठ के टुकड़े को जैसे छूकर चन्दन कर दिया
जो समन्दर हो गया वो प्यास का दुश्मन हुआ
बस इसी अहसास ने मुझको बादल कर दिया।
00
मैं चाहता हूँ ,मैं तेरी हर बात में मिलूं..............
जीवन की खुश्क धुप में बरसात में मिलूं ........................
कोई खुदा के दर पे मुझे ढूँढता फिरे ..............................
..
मैं भी किसी को प्यार की सौगात में मिलूं .............
धड़कन हो,या हो दर्द या अह्सासे मुहब्बत ............
मैं तुम्हारे दिल के हर ज़ज्बात में मिलूं ..............................
.....
तडपे हज़ारों दिल मगर हासिल न मैं हुआ............
तू चाहता है मैं तुझे खैरात में मिलूं ..............................
...........
खंडहर सहेजूँ ख्वाब के या रंग दूँ उसे ..........
मैं जिंदगी से कितने सवालात में मिलूं।
अंगार

अपना साया भी कभी खुद से जुदा होता है

कह कहे कमाल करते हो
आंसुओ से सवाल करते हो
अपना साया भी कभी खुद से जुदा होता है
शायद जुदा होता है जब किस्मत बुरा होता है
जो हर साये पर फ़िदा होता है
मुठ्ठियों में पकडे हुए
आंसुओ की मोती है
सच किस्मत भी कभी खुद पर रोती है
बचैन हो न जगती है न सोती है।
अरविंद योगी
मेरी ज़िन्दगी की दुआ कर रहा है
ये होता नहीं जुदा मेरे दिल से
तेरा दर्द भी योगी से वफ़ा कर रहा है।
अरविंद योगी

Sunday, March 13, 2011

अहिस्ता -अहिस्ता खत्म हयात (जीवन) होने को है..

सुनामी को समर्पित

ग़ज़ल
परछाइयां बढ़ने लगी रात होने को है.
अहिस्ता -अहिस्ता खत्म हयात (जीवन) होने को है..
अपने राज़ दिलों में रखना जहाँ वालों .
यहाँ हर क़दम पे प्रतिघात होने को है ..
खड़ी है कठघरे में मानवता आज .
और कितने ही सवालात होने को है..
होगा "अकेला" कहर और तबाही का मंज़र.
रुकेगी नहीं जो बरसात होने को है..

रणजीत गोहे "अकेला"
00
हक़ीक़त से हमें रु-बरु होना चाहिए .
क्या है ज़िंदगी से कीमती बताना चाहिए ..
ग़र "अकेला" एक झूठ से बचती है किसी की जां.
रख गीता पर हाथ सच से मुकर जाना चाहिए ..

रणजीत गोहे "अकेला"

प्रेम की गहरायी कम तो नहीं होती

पारदर्शी कांच के पीछे
प्रेम की गहरायी कम तो नहीं होती
बस छू ही तो नहीं पाटा
अपने हाथों से
लेकिन तुम्हारे गालों पर उभरा हुआ तिल
मेरे प्रेम की अन्तश्चेतना को
जब
निकल जाता है हौले से छूकर
तब मैं भीतर तक तुम्हारा हो जाता हूं
मेरे भीतर का कांच
बिखर जाता है
किरिच-किरिच
टूटकर।
डॉ.हरीश अरोड़ा

इस धरा पर हर नयन में इक सुनामी आ गया


गुलदस्ता-
इक समंदर भूख से कुछ इस कदर व्याकुल हुआ
कि किनारे जिंदगी खाने को पानी आ गया
इक सुनामी ने कहर ढाया जो उसको देखकर
इस धरा पर हर नयन में इक सुनामी आ गया
00
हार मानें क्यों अंधरों, मुश्किलों के बीच में
दिल जलाया जब हमीं ने महफ़िलों के बीच में
मौत से आँखें मिलाने का हुनर अब आ गया
हम जिए बेखौफ होकर कातिलों के बीच में।
00
बाद मेरी मौत के ये ही बचा रह जायेगा
में चला भी जाऊं तो मेरा लिखा रह जाएगा
प्यार के पौधों को सींचा मैंने इस उम्मीद पर
में रहूँ या न रहूँ ये गुलसितां रह जायेगा

पंकज अंगार

Thursday, March 10, 2011

लड़ाई लंबी चलेगी इसबार

राजीव दुबे की कविता-
अब यह उजाड़
एक टीस बन कर उतर गया है अंदर,
देखी नहीं जाती
यह बदहाली हमसे…
ऐ वक्त तू दिखा ले -
जो भी दिखाना हो तुझे,
हम भी जिद्द पर हैं -
लड़ाई चलेगी लंबी इस बार, हमारी जीत तक … ।

जो तुम सोचते हो कि -
यह देश है ठंडा अब न जागेगी चिंगारी कभी,
जो तुम समझते हो कि -
यहाँ अब न रहे लड़ने वाले कोई,
तो हम बता दें तुम्हें कि -
हमारी अच्छाई हमारी कमजोरी नहीं -
लिए शोले हम घूमते हैं अब भी,
आग जलेगी तुम्हें खाक में मिलाने तक … ।

ऐ वतन को लूटने वालों
तुम खाते हमारा ही हो,
ऐ वतन को तोड़ने वालों
तुम्हारी साँसें हम चलने दें, तभी तक हैं,
पर तुम्हें लगने लगा है कि
तुम बन शासक हमें नेस्तनाबूत कर सकते हो,
खड़े हो रहे हैं देखो नौजवां हमारे,
लड़ने को, तुम्हारी सत्ता हटाने तक… ।


क्या सोच तुम आए थे कि
हिन्द का खून पानी-पानी है,
क्या तुम ने मान लिया कि
अब यहाँ इस देश में न रहा कोई मानी है,
बहुत कर ली तुमने मनमानी
ऐ वतन के दुश्मन, बहुत वक्त गुज़र गया -
हिन्द ने ठानी है इस बार करेंगे घमासान,
तुम्हारा वजूद मिटाने तक … ।

Sunday, March 6, 2011

हे मेरे मन के मधुमास.

कविता-
हे मेरे
मन के मधुमास.

कोमल अधरों पर मृदु छाया
जीवन की श्रृंगारिक काया
नयनों की
नव मंजुल आस.
हे मेरे
मन के मधुमास.

बंधी हुई रश्मि पलकों पर
अम्बर की आभा अलकों पर
जीवन का चंचल परिहास
हे मेरे
मन के मधुमास.

अलक खोल नाचे मधुबाला
नयनों में भर परिमल हाल
बुझा रही
भावों की प्यास
हे मेरे
मन के मधुमास.

प्यास संचयन बनी अधूरी
ज्यों झरती हो सांझ सिन्दूरी.
थम गया उर का उल्लास
हे मेरे
मन के मधुमास.


-- डॉ. हरीश अरोड़ा

Sunday, February 20, 2011

सात प्रेम कविताएं

1
चुपके से
मैं तो चाहता था
सदा शिशु बना रहना
इसीलिए
मैंने कभी नहीं बुलाया
जवानी को
फिर भी
वह चली आई
चुपके से
जैसे
चला आता है प्रेम
हमारे जीवन में
अनजाने ही
चुपके से
2
प्रथम प्रेम
इंसान को
कितना कुछ बदल देता है
प्रथम प्रेम
उमंग और उत्साह लिए
लौट जाता है वह
बचपन की दुनिया में
कुछ सपने लिए…
दिन, महीने ,वर्ष
काट देता है
कुछ पलों में
कुछ वायदे लिए…
बेचैन रहता है
उसे पूरा करने के लिए
झूठ बोलता है
विरोध करता है
विद्रोह करने के लिए भी
तत्पर रहता है
सूख का एक कतरा लिए…
घूमता रहता है
सहेज कर उसे
अपने प्रियतम के लिए
हाँ,
सचमुच!
बावरा कर देता है
इंसान को प्रथम प्रेम।
3
याद
वैशाख के दोपहर में
इस तरह कभी छांव नहीं आता
प्यासी धरती की प्यास बुझाने
न ही आते हैं
इस तरह
शीतल फुहारों के साथ मेघ
इस तरह
श्‍मशान में शांति भी नहीं आती
मौत का नंगा तांडव करते
इस तरह
अचानक!
शरद में शीतलहरी भी नहीं आती
कलेजा चाक कर दे इंसान का
हमेशा के लिए
ऐसा ज़लज़ला भी नहीं आता
इस तरह
चुपचाप
जिस तरह
आती है तुम्हारी याद
उस तरह
कुछ भी नहीं आता

4
झूठ
जी भर के निहारा
सराहा खूब
मेरी सीरत को
छुआ, सहलाया और पुचकारा
मेरे सपनों को
जब मैं डूब गया
तुम्हारे दिखाये सपनों के सागर में
मदहोशी की हद तक
तब अचानक!
तुम्हारा दावा है
तुमने नहीं दिखाये सपने
क्या तुम
बोल सकती हो
कोई इससे बड़ा झूठ ?
5
बदल गये रिश्‍ते
पहले
मैं मछली था
और तुम नदी
पर अब हम
नदी के दो किनारे हैं
एक-दूसरे से
जुड़े हुए भी
और
एक-दूसरे से
अलग भी





6
तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे जाने के बाद
पता नहीं
मेरी आखों को क्या हो गया है
हर वक्त तुम्हीं को देखती हैं
घर का कोना-कोना
काटने को दौड़ता है
घर की दीवारें
प्रतिध्वनियों को वापस नहीं करतीं
घर तक आने वाली पगडंडी
सामने वाला आम का बगीचा
बगल वाली बांसवाड़ी
झाड़-झंकाड़
सरसों के पीले-पीले फूल
सब झायं-झायं करते हैं
तुम्हारी खुशबू से रची-बसी
कमरे के कोने में रखी कुर्सी
तुम्हारी अनुपस्थिति से
उत्पन्न हुई
रीतेपन के कारण
आज भी उदास है
भोर की गाढ़ी नींद भी
हल्की-सी आहट से उचट जाती है
लगता है
हर आहट तुम्हारी है
लाख नहीं चाहता हूँ
फिर भी
तुमसे जुड़ी चीजें
तुम्हें
दुगने वेग से
स्थापित करती हैं
मेरे मन-मस्तिष्क में
तुम्हारे खालीपन को
भरने से इंकार करती हैं
कविताएँ और कहानियाँ
संगीत तो
तुम्हारी स्मृति को
एकदम से
जीवंत ही कर देता है
क्या करुं
विज्ञान, नव प्रौद्यौगिकी, आधुनिकता
कुछ भी
तुम्हारी कमी को
पूरा नहीं कर पाते
7
मेरा प्यार
मेरा प्यार
कोई तुम्हारी सहेली तो नहीं
कि जब चाहो
तब कर लो तुम उससे कुट्टी
या कोई
ईष निंदा का दोषी तो नहीं
कि बिना बहस किए
जारी कर दिया जाए
उसके नाम मौत का फतवा
या फिर
कोई मिट्टी का खिलौना तो नहीं
कि हल्की-सी बारिश आए
और गलकर खो दे वह अपनी अस्मिता
या कोई सूखी पत्तियां तो नहीं
कि छोटी-सी चिंगारी भड़के
और हो जाए वह जलकर खाक
मेरा प्यार
सच पूछो तो
तुम्हारी मोहताज नहीं
तुम्हारे बगैर भी है वह

क्योंकि
मैंने कभी
तुम्हें केवल देह नहीं समझा
मेरे लिए
देह से परे
कल भी थी तुम
और आज भी हो
मेरा प्यार
इसलिए जिएगा सर्वदा
तुम्हारे लिए
तुम्हारे बगैर भी
उसी तरह
जिस तरह
जी रही है
कल-कल करती नदी।

- सतीश सिंह
प्रवक्ता से