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Saturday, January 28, 2012

जिनके हाथों में सिर्फ पंक



कितनी कुंठा, कितना विषाद ?
मन में उसके कितना प्रमाद !
गाथाएँ गढ़ता मनगढ़ंत,
यद्यपि बनता है बड़ा संत
जब निहित स्वार्थ तब अनुगामी,
जब स्वार्थ सिद्ध तो संग्रामी.
कैसा दुहरा पाया चरित्र ?
है कभी शत्रु है कभी मित्र.
यह नहीं जानता है गज पर 
श्वानों का कब पड़ता प्रभाव ?
यह व्यर्थ भूँकना है उसका,
है वृथा सखे, उसका दुराव.
क्षण भंगुर जीवन को साथी !
ऐसे बर्बाद नहीं करते.
जिनके हाथों में सिर्फ पंक,
हम उनको याद नहीं करते.
फिर भी उर में यह चाह सदा,
वह करे प्रगति, पाए सुयोग,
क्षमताओं का उपयोग करे
कुत्सित मन हो जाए निरोग.
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