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Saturday, June 16, 2012

विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य' और "यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012"

विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य' और "यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012"
(डॉ.) कविता वाचक्नवी



आज का सुप्रभात दरवाजे पर तेज खटखटाए जाने पर टूटी नींद से हुआ ।

 डाक में हिन्दी बुक सेंटर से अभी अभी कुछ ही दिन पूर्व प्रकाशित -  " विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य : संगोष्ठी समग्र "  ग्रंथ की  लेखकीय प्रति मिली है। 

यह ग्रंथ प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल जी के सम्पादन में छपा है और स्पेन के वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में हुई यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी (15-17 मार्च 2012)  में  प्रस्तुत किए गए सभी शोध पत्रों का संकलन है। 

पूरा ग्रंथ आर्ट पेपर जैसे कागज़ पर छपा है। ग्रंथ के स्वत्वाधिकार हिन्दी विभाग, विदेश मंत्रालय के पास सुरक्षित हैं। 


कुल 32 आलेख इसमें संकलित हैं।  लेखों का क्रम सत्रवार रखा गया है। 

मेरे आलेख " भाषा प्रकार्यों के अधुनातन संदर्भ और हिन्दी " को पृष्ठ  46 से 51 पर पढ़ा जा सकता है।



प्रकाशक का पूरा पता है  -

हिन्दी बुक सेंटर 
4/5-बी, आसफ अली रोड, नई दिल्ली 110 002 



सम्मिलित लेखक हैं -

सर्वश्री

  • उदय नारायण सिंह (विश्वभारती शांति निकेतन )
  • अफजाल अहमद (Lisboa)
  • अलका आत्रेय चूडाल (ऑस्ट्रिया)
  • आलेसांद्रा कोंसोलारो (इटली)
  • यूस्तीना कुरोव्स्का (बॉन, जर्मनी)
  • महेंद्र किशोर वर्मा (यॉर्क)
  • रमेश चन्द्र शाह (बेल्जियम)
  • ऐश्वर्ज कुमार (केंब्रिज )
  • गेनादी श्लोम्पेर (इज़राईल)
  • हर्मन वान ऑल्फेन (अमेरिका)
  • कविता वाचक्नवी (लंदन )
  • अरुण प्रकाश मिश्रा (स्लोवेनिया)
  • बिलजाना ज़्रनिक (क्रोएशिया )
  • दानूता स्ताशिक (पोलैंड )
  • हैंज़ वेर्नर वैस्लर (उपासला, स्वीडन )
  • इंदिरा गाज़िएवा (मॉस्को)
  • लुदमीला खोखलोवा (मॉस्को)
  • सबीना पोपर्लान (बुखारेस्ट, रोमानिया )
  • विजया सती (बुदापैस्ट)
  • मोहन कान्त गौतम (नीदरलैंड)
  • जगन्नाथ वी. आर. (वर्धा )
  • वैश्ना नारंग (दिल्ली)
  • कैलाश नारायण तिवारी (पोलैंड )
  • नवीन चंद्र लोहानी (स्विट्जरलैंड)
  • एस. वी. एस. एस. नारायण राजू (बुल्गारिया)
  • तात्याना औरन्स्कया (हैम्बर्ग, जर्मनी)
  • शिव कुमार सिंह (लिस्बन, पुर्तगाल )
  • दीप्ति गोलानी (बार्सेलोना, स्पेन)
  • श्रीश चंद्र जैसवाल (वय्यादोलिद, स्पेन)
  • अशोक चक्रधर (दिल्ली)
  • विभूति नारायण राय (वर्धा)
  • पूनम जुनेजा (मॉरीशस)

स्पेन संगोष्ठी के बारे में अधिक जानने व चित्रों के लिए निम्नलिखित लिंक्स क्लिक कर देखें - 




Thursday, January 5, 2012

"स्त्री होकर सवाल करती है!" : "कविता समय"





"स्‍त्री होकर सवाल करती है....!"
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी 


यदि आप जयपुर में हैं तो अवश्य सम्मिलित हों .....

आप सादर आमंत्रित हैं ...............................


"स्‍त्री होकर सवाल करती है....!"
(127 रचनाकारों की स्‍त्री विषयक कविताओं का संग्रह)


प्रकाशक - बोधि प्रकाशन (जिन्होंने प्रत्येक पुस्तक का दाम 100/- मात्र की अपनी प्रतिबद्धता के कारण नया कीर्तिमान स्थापित कर एक नई परंपरा को जन्म दिया व हिन्दी पुस्तकों के क्षेत्र में नई क्रान्ति के बीज रोप कर सर्वत्र ख्याति पाई है )

संपादक - डॉ लक्ष्‍मी शर्मा

पेपरबैक/प्रथम संस्‍करण - जनवरी 2012

पृष्‍ठ  - 384

मूल्‍य - 100 रुपये मात्र

लोकार्पण  - दिनांक 8 जनवरी 2012, रविवार, सुबह 11.45, ''कविता समय'' कार्यक्रम के कविता पाठ सत्र में

स्‍थान: राजस्‍थान हिन्‍दी ग्रंथ अकादमी, झालाना सांस्‍थानिक क्षेत्र, जयपुर


मुझे हर्ष है कि मेरी कविताएँ भी इस संकलन में सम्मिलित हैं।



384 पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्‍य 100 रुपये मात्र है (डाक से मँगाने पर पैकेजिंग एवं रजिस्‍टर्ड बुकपोस्‍ट के 50 रुपये अतिरिक्‍त)।



 इसे Bodhi Prakashan ने प्रकाशित किया है। 

उनके "बोधि प्रकाशन, एफ 77, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 302006 राजस्‍थान। संपर्क दूरभाष : 099503 30101, 08290034632 (अशोक) " के पते से इसे क्रय किया जा सकता है। 

जो भी मित्र इस पुस्तक की समीक्षा/ पुस्तक चर्चा / रिव्यू इत्यादि लिखें, उनसे निवेदन है कि कृपया उसे Maya Mrig जी, बोधि प्रकाशन तथा मुझसे + अन्य सम्मिलित लेखकों से अवश्य बाँटें/ सूचित करें।

कविता समय कार्यक्रम की अद्यतन जानकारियों के लिए देखें -  यह लिंक 

Friday, December 30, 2011

भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन : `युद्धरत आम आदमी' व 'हाशिए उलाँघती स्त्री'


भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन :  `युद्धरत आम आदमी' व 'हाशिए उलाँघती स्त्री' 
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी 


वर्ष 2004 में  रमणिका फ़ाउंडेशन की पत्रिका "युद्धरत आम आदमी" के दो विशेषांकों की योजना रमणिका गुप्ता जी ने बनाई थी। एक विशेषांक भारतीय भाषाओं की स्त्री कविता का और दूसरा स्त्री लेखन (गद्यभाग) का। 


यह निस्संदेह एक बड़ी विशाल व श्रमसाध्य योजना थी। रमणिका दी' अपने जुझारूपन, कर्मठता  और अतीव उत्साह के लिए भी अपने आप में विशिष्ट उदाहरण हैं। 2008 में उन्हें आए हृदयाघात के दिनों में उन्होने स्वयं अस्पताल से ही फोन कर के मुझे अपनी रचनाएँ इन विशेषांकों के लिए भेजने को कहा। मैंने उनके जीवट और आत्मीय स्नेह के चलते इसी उद्देश्य से एक नई  (काफी लंबी ) कहानी लिखी और `सहेली होने का पाप' शीर्षक से सितंबर 2008 में उन्हें  भेज दी। (गत दिनों इस कहानी का नाम बदल कर केवल `पाप' कर दिया है)


इस बीच वर्ष 2009 के दिसंबर माह में भारत जाने पर मैं लंबी अवधि तक (लगभग 15 दिन ) रमणिका जी के आवास पर ही रुकी। उन दिनों "हाशिये उलाँघती स्त्री" के पद्य भाग के दो खंडों में होने की योजना पर कार्य चल रहा था। रमणिका जी रात-रात भर बैठ कर प्रूफ देखा करती थीं और विविध भारतीय भाषाओं की हिन्दी में अनूदित हो कर आई कविताओं के पुनर्लेखन की भी आवश्यकता पड़ा करती थी ताकि उन्हें हिन्दी के मुहावरे में सही सही ढाला जा सके। प्राप्त कविताओं में से कुछ कविताओं को उन दिनों रमणिका जी के साथ बैठ कर नए रूप में ढाला, ढलते देखा। 


अंततः `युद्धरत आम आदमी' का  `हाशिए उलाँघती स्त्री' नामक  भारतीय स्त्री कविता का भास्वर संकलन (2 अंकों में) तैयार हो कर आ गया।  26 मार्च 2011 को इनका लोकार्पण  साहित्य अकादेमी, रमणिका फाउण्डेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय कार्यक्रम में भव्य तरीके से सम्पन्न हुआ। 


मेरी लेखकीय प्रतियाँ भारत के हमारे डाक पते पर भिजवा दी गईं। जुलाई में  उनकी स्कैन प्रति प्राप्त होने पर उन्हें देख पाने का सुयोग मिला। 


`हाशिये उलाँघती स्त्री' के इस भास्वर संकलन का पहला खंड हिन्दी कविताओं का है व दूसरा खंड हिन्दी में अनूदित भारतीय भाषाओं की कविताओं का।  

दोनों अंकों की संपादक हैं रमणिका गुप्ता जी और अतिथि संपादक हैं  कवयित्री `अनामिका' । 


विशेषांक (प्रथम अंक) में मेरी जो कविताएँ सम्मिलित हैं, वे हैं -


१. बच्चियो
२. रुमालों पर 
३. मैं कुछ नहीं ..... 
४. मैंने दीवारों से पूछा 
५. औरतें डरती हैं
६. गौरैया

 पढ़ते समय कृपया ध्यान रखें कि मेरी इन कविताओं के प्रकाशन में कुछ बहुत भारी त्रुटियाँ रह गई हैं। यथा, पहली वाली कविता में एक अन्य कविता का अंश जुड़ा हुआ है (आधी एक व आधी दूसरी मिला कर ) और अंतिम कविता में भी कुछ ऐसी ही चूक आ गई है। टायपिंग/प्रूफ और वर्तनी की त्रुटियाँ छूट गई हैं।   अस्तु ! इतनी बड़ी योजना में अनेक लोगों व लंबे समय तक चली प्रक्रिया के चलते ऐसी त्रुटियाँ विशेष महत्व नहीं रखतीं।  इन कविताओं का सही पाठ वागर्थ पर अथवा कविताकोश में संकलित मेरे संकलन पर पढ़ा जा सकता है। :) 

-(डॉ.)  कविता वाचक्नवी







आयोजन के पश्चात रमणिका फाउंडेशन एवं साहित्य अकादेमी द्वारा 26 मार्च 2011 को जारी समाचार की प्रति - 


"राजधानी दिल्ली में पहली बार 25 भिन्न भारतीय भाषाओं की स्त्रीवादी कवयित्रियों की अनुगूंज सुनाई दी। स्त्री मुक्ति और स्त्री सौंदर्य की परिभाषा को नये सिरे से गढ़ते हुए महिला कवियों ने एकमत से कहा कि अब स्त्रीवादी लेखन को लेकर आनंद का समय आया है। मौका था साहित्य अकादेमी, रमणिका फाउण्डेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ के संयुक्त तत्वावधान में ‘हाशिये उलाँघती स्त्री’ कविता-पाठ पर एक दिवसीय कार्यक्रम का। 

26 मार्च को हुए इस कार्यक्रम ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी एक सांझे मंच की तरह भारत की तमाम भाषाओं के साहित्य के तौर पर मिलाने का काम कर रहा है। रमणिका फाउण्डेशन के साथ साहित्य अकादमी ने और भी काम किया है। उन्होंने बताया कि रमणिका फाउंडेशन द्वारा तैयार आदिवासी अंक को देख कर एक आदिवासी ने कहा कि ऐसा कार्य तो हमने आज तक नहीं देखा। उन्होंने रमणिका फाउंडेशन के कार्य को रेखंकित करते हुए कहा कि इस आयोजन के जरिये उन्होंने एक इतिहास रच दिया है।

रमणिका गुप्ता अध्यक्ष रमणिका फाउण्डेशन एवं संपादक ‘युद्धरत आम आदमी’ के आरंभिक भाषण में ें ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ विषयक गोष्ठी और इसी नाम से इसी विषय पर प्रकाशित युद्धरत आम आदमी के विशेषांक की स्त्री-दिवस के उपलक्ष्य में विशेष चर्चा करते हुए स्त्री मुक्ति की अवधारणा के विकास के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि कविता में स्त्री मुक्ति की अवधारणा के बीज हिन्दी में मीरा, पंजाबी में पारो परेमन और में कन्नड़ की अक्कमहा देवी (अक्कअम्मा) तक जाते है। इस संकलन में हमने 334 स्त्री मुक्ति पर लिखने वाली कवयित्रियों को शामिल किया है जिनमें 127 हिन्दी की हैं और 207 हिन्दीतर भाषाओं की। इन सभी भिन्न-भिन्न भाषी कविताओं में स्त्री मुक्ति का एक सुर गूंजा है, भले उसका स्वर, लय या धुन भिन्न-भिन्न हो। अपने आरंभिक वक्तव्य में रमणिका गुप्ता ने विशेषांक की तैयारी के दौरान आई चुनौतियों के बारे में बताया और कहा कि उनकी कोशिश स्त्रिायों को पुरुष के खिलाफ खड़ा करना नहीं है। स्त्री की मुक्ति का अर्थ पुरुष से मुक्त होना लगा लिया जाता है, देह की मुक्ति का आशय यौनता से लगाया जाता है जबकि हमारा आशय मानसिक तथा दैहिक स्तर पर अपने निर्णय लेने के अधिकार से है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्त्री-मुक्ति के आंदोलन का मतलब यह नहीं कि इसमें सिर्फ महिलाएं ही शामिल हों बल्कि यह पुरुषवादी दृष्टि से सोचने-समझने की एक खास मानसिकता में कैद हो चुके समाज को मुक्त करने को आंदोलन है, स्त्री-पुरुष को समाज में समान दर्जा दिलाने की मुहिम है। जाहिर है मुक्ति के इस आंदोलन में स्त्री-पुरुष दोनों की साझी जरूरत है। उन्होंने कहा कि स्त्रियों को पुरुष-दृष्टि से सौंदर्य की परिभाषा गढ़ने की जगह अपनी सौंदर्य-दृष्टि विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि एक मध्यवर्गीय कामगार महिला, एक मजदूर महिला और एक अभिजात वर्ग की महिला के लिए स्त्री-मुक्ति की अवधारणाएं अलग-अलग हैं। उनके सौंदर्य की कसौटियां भी अलग-अलग हैं। हो सकता है कि एक अभिनेत्री के लिए कमनीय देहयष्टि की जरूरत हो, पर एक मजदूर महिला के लिए स्वस्थ और हट्टे-कट्टे शरीर की आवश्यकता है। इसलिए महिलाओं को भी सौंदर्य-शास्त्रा की पुरुषवादी जकड़न और बाजारवादी दृष्टि से मुक्त होने की जरूरत है, जिसका वे चाहे-अनचाहे शिकार हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि स्त्रियों को अपने सौंदर्य की कसौटी खुद गढ़ने की जरूरत है। उन्हें पुरुषों के लिए नहीं, अपने लिए सुंदर दिखने की जरूरत है। सौंदर्य के चालू मुहावरों के हिसाब से नहीं वरन अपने जरूरत के मुताबिक अपने सौंदर्य की नयी परिभाषा गढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यहां असल लड़ाई निर्णय के अधिकार और समानता की है जिससे यह पुरुषवादी समाज हर क्षण आतंकित रहता है। गुजरात की कवयित्री योगिनी श्क्ल की कविता की ओर ध्यान खींचते हुए उन्होंने कहा कि हमारे यहां श्रृंगार की कविताएं खूब होती हैं। विडंबना देखिये कि स्त्रियों को रोशनी कहते हैं और उनसे उनका सूरज छीन लिया जाता है। उन्होंने कहा कि आकर्षण सिर्फ सूरत का नहीं, सीरत का भी होता है। उन्होंने बताया कि पूर्वोत्तर में सूर्य को स्त्राी माना जाता हैµयानी शक्ति का प्रतीक स्त्री है। यह दो संस्कृतियों व मानसिकता के सामाजिक ढांचे में एक महत्त्वपूर्ण फर्क को रेखांकित करता है। 

समारोह के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध चिंतक भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर के सचिव तथा रमणिका फाउण्डेशन के ट्रस्टी सदस्य गणेश नारायण देवी ने युद्धरत आम आदमी पत्रिका के विशेषांक हाशिये उलांघती स्त्री का विमोचन किया और गोष्ठी के उद्घाटन व्याख्यान में कहा कि शिक्षा और चिकित्सा के स्तर पर केवल गरीब स्त्रिायों की ही नहीं सम्पन्न स्त्रियों की भी उपेक्षा की जाती है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी देशों में तो उन्नीसवीं सदी के मध्य तक महिलाओं को लेखक ही नहीं माना गया। हमारे यहां स्थिति थोड़ी भिन्न थी। हमारे यहां मीरा को भले जहर पीना पड़ा था लेकिन उनकी कविताएं घर-घर पहुंचीं। उन्होंने कहा कि अब स्त्रियों की दशा में थोड़ा सुधार आया है और देश में शिखर के संवैधानिक पदों पर महिलाएं जरूर आ गयी हैं पर आम महिलाओं की हालत में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है। अखबार की खबरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं और भी असुरक्षित होती जा रही हैं। एक तरफ देश का विकास हो रहा है और इस इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास का बोझ जैसे महिलाओं के सिर पर ही डाल दिया गया है। उन्होंने ‘हाशिये उलांघती स्त्राी’ विशेषांक के प्रकाशन को तमाम निराशाओं के बीच अंधेरे में उम्मीद की चमक बिखेरने वाला ऐतिहासिक घटना कहा। उन्होंने आगे कहा कि स्त्री-स्वर का इस स्वरूप में आना एक नयां इतिहास गढ़ना है। आशीष नंदी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि गांधीजी ने सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और नमक सत्याग्रह का तरीका स्त्रियों से ही ग्रहण किया। उन्होंने साहित्य अकादमी से अपेक्षा की कि इन दोनों खण्डों का सम्मिलित भाषाओं में भी अनुवाद किया जाना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात कवि तथा ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि साहित्य अपने अंधेरों के समक्ष खड़ा होने की हिम्मत जुटाता है, उससे भागता नहीं है और न ही उसे छुपाने की कोशिश करता है। स्त्रियों का यह लेखन साहित्य में लोकतंत्रा को मजबूत स्थिति प्रदान करता है। इस संग्रह में संग्रहित कविताओं को उन्होंने नयी दुस्साहसिकता का उपक्रम कहा। रमणिका गुप्ता की बात की ताईद करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य का सृजन करने वाली स्त्रियों को पुरुषों की स्थापित सौंदर्य दृष्टि से अलग हट कर अपनी सौंदर्य दृष्टि गढ़नी चाहिए। साथ ही यह अपेक्षा भी दर्ज की कि स्त्रियों के साहित्य से एक नये तरह का कर्म-सौंदर्य निकलना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्त्रियां अपने लेखन में बहुत हद तक सामाजिकता की बात करती हैं लेकिन उसमें उनकी अंतरंगता गायब है। 

प्रसिद्ध कवयित्री एवं युद्धरत आम आदमी के ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ के विशेष अंक की अतिथि संपादक अनामिका ने अपने बीज भाषण में बताया इस संकलन में संकलिता कविताएं एफ.आई.आर. की तरह उपस्थित हैं। यह स्त्री आंदोलन ऐसा आंदोलन है जिसने एक बूंद भी खून नहीं बहाया और चहुंमुखी विस्तारित हो रहा है। स्त्रियों को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती हैं ये कविताएं नए मानदंड, नए प्रतिमान गढ़ती हैं ये कविताएं। उन्होंने कहा कि स्त्री चेतना की बेल कैद की दीवारों के ऊपर चढ़ कर आजादी का अनुभव करने लगी हैं। उन्होंने कहा कि यह बेल अब इस कदर ऊपर चढ़ गयी है कि हमें अब इनसे आनंद फल पाने की उम्मीद बांधनी चाहिए। 

मलयालम की आलोचक के. वनजा ने दक्षिण भारत में स्त्री मुक्ति की काव्यधारा के विकास पर अपना आलेख पढ़ा। युद्धरत आम आदमी की सहयोगी संपादक दलित आलोचक एवं कवयित्री हेमलता महिश्वर ने उत्तर भारत की काव्य धारा में स्त्री मुक्ति के अंकुरों के पेड़ बनने तक की विकास यात्रा का ब्योरा देते हुए बताया कि समस्त कवयित्रियों के स्वर में एकसूत्राता दृष्टव्य होती है। यह एकसूत्राता स्वयं के प्रति निष्ठुर समाज के प्रत्येक अत्याचार का विरोध अभिधा, व्यंजना एवं लक्षणा में व्यक्त करती हैं। यह पहला अवसर था जब बाइस विभिन्न भारतीय भाषाओं की स्त्रीवादी कवयित्रियां, दिल्ली में एक मंच पर उपस्थित हुईं। इस सत्रा में के. वनजा की ‘चित्रा मुद्गलः एक मूल्यांकन’ नामक आलोचनात्मक पुस्तक का विमोचन अशोक वाजपेयी और गणेश देवी ने किया। 

उद्घाटन सत्रा में सलमा, प्रतिभा नंदकुमार, ग्रेस कुजूर ने काव्य पाठ किया। तीसरे सत्रा में दीप्ति नवल का शामिल होना कार्यक्रम का अतिरिक्त आकर्षण था। कविता-पाठ के तीन सत्रों में अपनी कविताओं से श्रोताओं को आंदोलित करने वालों में प्रमुख थी बी. संध्या (मलयालम), कुट्टी रेवती (तमिल), शाहजहाना (तेलुगू) सोमा बंद्योपाध्याय (बांगला), मीनाक्षी गोस्वामी बरठाकुर (असमिया), जोगमाया चकमा (चकमाµत्रिपुरा) हीरा बनसोडे (मराठी), उषा उपाध्याय (गुजराती), दाँङी चाँडथू (मिजो), लाइरेनलाकपम (पैतैµमणिपुरी), निरुपमा दत्त(पंजाबी), शुभा, सविता सिंह, रंजना जायसवाल, अनिता भारती (हिंदी), विभा रानी (मैथिली), निर्मला पुतुल (संथाली), सरिता बड़ाइक (नगपुरिया झारखंड), दरख़्शां अंदराबी (कश्मीरी), तरन्नुम रियाज (उर्दू)श्, दीप्ति नवल, लक्ष्मी कन्नन (अंग्रेजी)। इस आयोजन में हिन्दी की तीन, अंग्रेजी की दो, उर्दू, मराठी, गुजराती, पंजाबी, बांगला, ओड़िया, मिजो, चकमा, मणिपुरी-पैतै, असमिया, संथाली, नगपुरिया, कश्मीरी, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ भाषा की एक-एक, तमिल की दो। 

रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित ‘युद्धरत आम आदमी’ के ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ कविता अंक की अतिथि संपादक हैं अनामिका। सम्पादन सहयोग में हेमलता महिश्वर, कंचन शर्मा और उषा उपाध्याय, साॅलजी थॅमस, हरीश परमार हरप्रीत और विपिन चैधरी का नाम लिया गया!

भारतीय स्त्री कविता के इस भास्वर संकलन पर 2004 से काम शुरु हुआ। सात-आठ वर्षों के अथक संयुक्त श्रम का नतीजा है हिन्दी और हिन्दीतर कविताओं पर केन्द्रित ये दो भाग जिनका लोकार्पण इस अवसर पर गणेश नारायण देवी के हाथों हुआ। स्त्री-मुक्ति आंदोलन की चार पीढ़ियाँ भारतीय भाषाओं में अपनी सर्जना का प्रकाश कैसे फैला रही हैµ इसका जायजा यहाँ मिलता है।

इस अवसर पर रमणिकाजी की कहानी ‘नई मेनका’ का सजीव पाठ एवितोको की ओर से मुम्बई की विभा रानी ने किया। विभा रानी के नाटक ‘आओ तनिक प्रेम करें’ और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ पर मोहन राकेश अवार्ड 2005 मिला। उनके ब्लाॅग ‘छम्मकछल्लो कहिस’ पर 2009 में लाडली इंडिया अवार्ड मिला। कार्यक्रम के तीन सत्रों का कुशल संचालन अल्का सिन्हा, सुधीर सागर और पूनम तुषामड़ ने किया।"

Tuesday, September 13, 2011

अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी-भाषा-लेखक-संघ के गठन की घोषणा




                                अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी-भाषा-लेखक-संघ के गठन की घोषणा 
 - (डॉ.) कविता वाचक्नवी 



वर्ष 2002 में जब "विश्वम्भरा" की स्थापना की थी तब जो कारक मन में रहे थे, उनकी अपनी एक पृष्ठभूमि थी। 1995 में नॉर्वे में रहते हुए, बचपन से रक्त में हिन्दी साहित्य, भाषा और संस्कृति के प्रति जड़ों में पोसा हुआ संस्कार बेकल होकर अंधाधुंध किसी खोज में डूबा रहता, उसके परिणाम स्वरूप एक स्वप्न रूपाकार ले रहा था, जिसमें मूलतः संस्कार के उस ऋण से उऋण होने के लिए छटपटाहट भरती जा रही थी। उऋण तो यद्यपि कभी हुआ नहीं जा सकता किन्तु उऋण होने का यत्न करना तो अवश्य चाहिए था। जिन-जिन से कुछ भी सीखा-पाया है, उन-उन के दाय को अधिकाधिक लोगों व अधिकाधिक समय में (भविष्य) , अधिकाधिक माध्यमों से जितना संभव हो उतना प्रचारित प्रसारित कर देना उसकी एक प्रमाणित विधि हो सकती थी। 


उसी का परिणाम था " विश्वम्भरा : भारतीय जीवनमूल्यों के प्रसार की संकल्पना " का गठन । संस्था का उद्घाटन कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी ने किया। ज्ञानपीठ गृहीता डॉ. सी नारायण रेड्डी ने अपनी ओर से संस्था के मुख्य संरक्षक होना स्वीकार किया। संस्था ने मूलतः `फील्डवर्क' को प्रमुखता देते हुए बिना शोर शराबे के, बड़े कार्य किए ; यद्यपि अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी संस्था ने आयोजित किए जिनमें विष्णु प्रभाकर जी, प्रभाकर श्रोत्रिय जी प्रभृति अनेकानेक भाषा, साहित्य व संस्कृति के ख्यातनाम वरिष्ठ व्यक्तित्वों ने स्वयं उपस्थित होकर संस्था के विशद उद्देश्यों के प्रति अपना समर्थन व सहयोग दिया। उस पर फिर कभी विस्तार से लिखा जा सकेगा तो लिखूँगी।




                   उस समय उद्घाटन अवसर छापे गए आमंत्रण पत्र में संस्था के उद्देश्यों आदि की जानकारी देता कार्ड का एक पन्ना 




पश्चात जैसे जैसे संसाधनों की सार्वभौमिकता के माध्यम, ऊर्जा, श्रम व शक्ति, परिणाम, परिणामों की व्यापकता, दीर्घकालिकता और गति का गणित समझ आता चला गया तैसे तैसे "विश्वंभरा" का वह अभियान सर्च इंजिनों, आधुनिक समाज और संसाधनों के प्रयोक्ताओं की मानसिकता को समझ कर गत 5 वर्ष की नेट रँगाई के विविध पक्षों सहित 23 अक्तूबर 2007 को हिन्दी भारत + हिन्दी-भारत की काया में आ गया। 


इन सब बीती बातों को आज स्मरण करने का एक अन्य बड़ा कारण है। भारतीय भाषाओं के इतिहास में आज का दिन महत्वपूर्ण है। अतः गत कुछ समय से संकल्पित अनुष्ठान को आज उद्घाटित करने से अच्छा अवसर और क्या हो सकता है ?


विदेशों में बसे, जन्मे, या नागरिकता ले चुके भारतवंशियों के एक बृहत अंतरराष्ट्रीय सामूहिक मंच की योजना कई दिन से मन में थी। अभी तो यही स्वप्न है कि यह एक ऐसा साझा मंच बने, जो भारत से बाहर किसी भी देश में रहने वाले भारतवंशी लेखकों, भाषाचिंतकों, भाषा टेक्नोलॉजी से जुड़े मुद्दों पर काम करने वालों का अपना मंच हो। अब तक कहीं कोई ऐसा सामूहिक संयुक्त उपक्रम नहीं हुआ है, जिसमें एक स्थान पर सभी आप्रवासी भारतीय जो भाषा, लिपि, साहित्य इत्यादि विषयों माध्यमों से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं, उनको संयुक्त स्वर/रूप दे। भूमंडलीकरण से उपजे बाजार के खतरे में भारतीय भाषाओं और लिपियों पर मंडरा रहा खतरा वस्तुतः भारतीयता पर मंडरा रहा खतरा है। भाषा और साहित्य ही में वह शक्ति होती है कि संस्कृति को विरासत के रूप में सँजो कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित कर पाए। आधुनिक संचार माध्यमों में भारतीय भाषाओं का सिमटता स्वरूप और शक्ति हमें इस बाज़ार के खतरों से परिचित करवाने के लिए पर्याप्त हैं। जिस भाषा का व्यवहार आधुनिक संचार माध्यम करते हैं, उसकी बड़ी स्वीकार्यता और प्रचलन भी एक अन्य संकेत देते हैं। ऐसे में अपनी भाषाओं, लिपियों को इन माध्यमों की शक्ति के प्रयोग से विश्वबाजार में स्थापित कर देने की चुनौती भी बड़ी है; क्योंकि आने वाली पीढ़ियों के भाषाकोशों में वही भाषा सुरक्षित रहेगी, जो भाषा उनके माध्यमों द्वारा उनके पास पहुँची होगी। ऐसे में भारतीयता किस रूप में व कितनी पहुँचेगी यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है। 


"विश्वम्भरा" के ऊपर उद्धृत उद्देश्योंकी भांति संस्था अधुनातन माध्यमों का प्रयोग अपने कार्य-विस्तार हेतु तो करेगी ही अपितु साथ ही इन माध्यमों में साहित्य व भाषा के विविध स्वरूपों की पड़ताल, प्रयोजनमूलक व समाज-भाषिक पक्षों, अनुवाद, समाजभाषिक संदर्भ में वैश्विक हिंदी/भारतीय भाषाओं की स्थिति का आकलन, विविध स्तरों व क्षेत्रों की भाषा के बदलते स्वरूप आदि को समझने - समझाने व उनके अध्ययन अध्यापन आदि से जुड़े सरोकारों पर भी बल देगी। ताकि भारतीय भाषाओं विशेषतः हिन्दी को उसके सभी स्तरों, सभी रूपों व सभी माध्यमों में उसकी यात्रा के सही व सार्थक परिप्रेक्ष्य में देखा समझा जा सके, उसके साहियिक व साहित्येतर पक्षों से संबन्धित व्यक्तियों, रचनाकारों को जोड़ा जा सके, उनके अवदान को एक स्थान पर एकत्रित कर उनके कार्यों में सहभागिता व मूल्यांकन में आवश्यक सहयोग हेतु वातावरण निर्मित किया जा सके। 

आज तो सूत्रपात मात्र है, धीरे धीरे विस्तार देते हुए आप्रवासी लेखकों के एक लेखक-कोश और डाटाबेस बनाने की भी योजना मन में है। इस कोश में प्रारम्भ में मुख्यतः हिन्दी में किसी भी विषय अथवा विधा में लेखन करने वालों को जोड़ा जाएगा। पश्चात विषयवार, विधावार, क्षेत्रवार, भाषावार अलग अलग और भी विस्तार जोड़े जाएँगे। संभव है, आगे चल कर अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों और भाषाकर्मियों को भी सम्मिलित करना हो; साथ ही भारतीय मूल के उन लेखकों, भाषाकर्मियों को भी जो किसी भी अन्यभाषा द्वारा भारतीयता को किसी भी रूप में आगे सिंचित कर रहे हैं। 


इसी प्रकार एक योजना आप्रवासियों द्वारा हिन्दी में प्रकाशित की जा रही पत्र-पत्रिकाओं के कोश निर्माण / डाटाबेस की भी है। वह भले ही नेट पत्रिका हो या प्रिंट की, मासिक हो अथवा छमाही, किसी भी संगठन, संस्था, व्यक्ति अथवा विषय से जुड़ी हो ; सबका स्वागत है। 


आज मुख्यतः इस संस्था / मंच ("विश्वम्भरा" : अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी-भाषा-लेखक-संघ ) के गठन व स्थापना की औपचारिक घोषणा करने के उद्देश्य से लिखना प्रारम्भ किया था। यह एक खुला मंच है, कोई भी आप्रवासी भारतीय, भले ही वे किसी भी देश में रहते हों, संस्था से जुड़ें और उसकी योजनाओं की सिद्धि में अपनी सहभागिता दें। जिन-जिन के पास उनके परिचय क्षेत्र के उपर्युक्त विषय से सम्बद्ध ऐसे व्यक्तियों के पते, परिचय, चित्र व संपर्क सूत्र आदि हों, वे उन सब को इस से जोड़ें। किसी पत्रिका के विषय में जानकारी है तो उसे जोड़ें। ध्यान रहे आपका जरा-सा भी सहयोग इतिहास- निर्माण की इस प्रक्रिया में बड़े काम का हो सकता है। जिन्हें अपने-अपने अथवा दूसरे किसी देश के ऐसे व्यक्तियों की कोई भी जानकारी हो, भले उनका काल कोई भी रहा हो, उसे भी बताएँ, जुड़वाएँ | संस्था गत 100 वर्ष या उस से भी अधिक के जितने भी ज्ञात- अज्ञात ऐसे व्यक्ति हैं, उन सब को उस कोश में जोड़ने का विचार रखती है । इसी प्रकार पुरानी से पुरानी पत्र- पत्रिकाओं और उनके इतिहास से संबन्धित हर वस्तु को भी। 


अलग अलग देशों में रहने वाले कुछ मित्रों- परिचितों को क्रमश: उस-उस देश के प्रतिनिधि के रूप में जोड़ा जाएगा। शुभचिंतकों व सलाहकारों के सहयोग की भी सदा आवश्यकता पड़ेगी, वे अपना सहयोग व आशीर्वाद सदा संस्था को देते रहें। प्रतिनिधियों व सलाहकारों के अतिरिक्त और भी सभी लोग जो भी इसे पढ़ें, जानें, वे सब खुले मन व भावना से इस के उद्देश्यों की पूर्ति में सहयोग करें। यह एक प्रयास है ताकि भाषा, लेखन व भाषा टेक्नालॉजी के किसी भी क्षेत्र से जुड़े आप्रवासी भारतवंशियों को समीप लाया जा सके। मैं केवल जोड़ने वाला सूत्र-भर हूँ। आगे किस रूप में क्या कार्य-योजनाएँ कैसे रूपाकार लेंगी, यह तो समय बताइएगा। 


हिन्दी ( भारतीय भाषाओं) और भारत से प्रेम करने वालों के मध्य परस्पर विचारों के आदान-प्रदान के निमित्त इसे गठित किया जा रहा है। भाषा, साहित्य, कला एवं ज्ञान-विज्ञान के विविध अधुनातन विषयों / क्षेत्रों ( उनकी समस्याओं, समाधान आदि से जुड़े पक्षों ) पर संवाद व पारस्परिकता का वातावरण बना कर उन्हें एक सामूहिक मंच प्रदान करना, सम्पूर्ण विश्व में उन्हें प्रचारित प्रसारित कर विकास का वातावरण और पृष्ठभूमि बनाने का यत्न करना, उन्हें भारतीयता की पहचान के रूप में स्थापित करना, भावी पीढ़ियों के लिए तथ्यों व सामग्री को समायोजित कर के सँजोने, शोधार्थियों के लिए भारत से बाहर हुए साहित्य व भाषा विषयक कार्यों की सामग्री व उसके मूल्यांकन में सहयोग देना जैसे अनेकानेक कार्य संस्था की परिधि में आते हैं। उन पर धीरे धीरे समयानुसार संसाधनों की उपलब्धता व सामाजिकों के सहयोगानुसार विचार किया जाएगा। 


आपके सुझाव भी आमंत्रित हैं। सहयोग भी अपेक्षित, वांछित है। विचार आपको करना है कि इस बड़े यज्ञ में आपकी आहुति कैसे व कब पहुँचेगी। 


"विश्वम्भरा" अर्थात् "यत्र विश्वम् भवत्येक नीडम्"


प्रतिक्रियाओं व सहयोग की प्रतीक्षा में ...... 


सादर 
क. वा.