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Sunday, December 26, 2010

प्रेम ही सत्य है

श्री प्रशांत योगीजी को बहुत-बहुत बधाई इतने सारगर्भित वक्तव्य के लिए। उन्होंने धार्मिक अनुशीलन चाहे वह किसी धर्म-ग्रन्थ से सम्बंधित हो या किसी धर्म गुरु या संत-फकीर से सम्बंधित हो, के व्यर्थ के पाखण्ड का खंडन बड़ी बारीकी से किया है क्योंकि उससे इंसान की सोच नहीं बदली है। वह वहीँ है जहाँ था। फिर वह धर्म-ग्रंथों का व्यर्थ बोझ लिए क्यों जी रहा है। श्री योगीजी ने निष्कर्षतः बताया है कि सभी धर्म-ग्रंथों का गंतव्य एक ही है और वह है -प्रेम। प्रेम जीवन का प्राकृतिक और सार्वभौमिक सत्य है। अतः प्रेम जीवन का अभिन्न अंग है। वह प्रेम ही सत्य है। जो सत्य है वही जीवन की जीवन्तता है। इसलिए उसी सत्यरुपी प्रेम का अनुशीलन करना अपरिहार्य है। कहा करूं, जैसौ आयौ वैसौ लिख दयौ। आगे कूँ भी ऐसौ ही लिखते रहियौ। बडौ ज्ञान मिलौ है। आपकूं मेरौ प्रेम-नमन ।
भगवान सिंह हंस
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