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Friday, December 31, 2010

नीरव और सहकारिता


सभी लोकमंगल के सदस्यों एवं देशवासियों तथा प्रवासी भारतियों के लिए नव वर्ष २०११ ढ़ेर सारी खुशियाँ लेकर आये।
आदरणीय विश्वमोहन तिवारीजी नमन। आपको बहुत-बहुत बधाई नीरव पर सारगर्भित आलेख के लिए। आपकी प्रथम एवं शुभारम्भ पंकित ही सम्पूर्ण सार को आपने में समेटे हुए है, द्रष्टव्य- नीरवजी जैसी सहकारिता साहित्य में दुर्लभ है और खासकर इस स्वार्थमय जमाने में। अंगीकारयोग्यबाकई नीरवजी एक सह्रदय इंसान हैं और जहाँ सह्रदयता होती है वहाँ प्रेम स्वतः होता है, जहाँ प्रेम होता है वहाँ सान्निध्यता होती है एवं जहाँ सान्निध्यता होती है वहाँ संस्था होती है। उस संस्था में व्यक्ति व्यक्ति न होकर स्वयं संस्था बन जाता है। चाहे जिधर से आप वहाँ पर द्रष्टिपटल डालिए आपको संस्था ही द्रष्टिगोचर होगी। वही संस्था सहकारिता बन जाती है। यह है ही नहीं चाहे ब्लॉग हो, चाहे दूरदर्शन या आकाशवाणी हो, चाहे काव्यगोष्ठी हो, चाहे साहित्यिक विचार-विमर्श हो और चाहे विश्वमोहन तिवारीजी के साथ व्यंग्यात्मक बैठक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल फाउन्देशन या सर्वभाषा संस्कृति सवन्वय समितितर हो उसमें हरेक की भागीदारी अपने आपको सहयोगी या सह्कर्ता महसूस करती है अर्थात कुछ करने की सोचती है। लेकिन उसका केंद्रबिंदु या उसका सूत्रधार जहाँ से उस सूक्ष्म ज्योति का विकीरण हो रहा है और वह विकीरण की ऊष्मा सर्वपुंजों को प्रकाशित कर रही है वह नीरव है यानी निः शब्द । जब नीरव से पहले सुरेश सांगोपांग हो जाता है तो वह इंद्रलोक की ही नहीं बल्कि त्रिलोक की सैर करता है और यदि उससे और पहले ( सुरेश से पहले ) पंडित का सवन्वय हो जाता है तो वह त्रिलोक की ही नहीं बल्कि वह साहित्यलोक में त्रिवेणी बहाता है जहाँ पर दर्शन, व्यंग्य और कवित्व का साक्षात अबलोकन होता है। यही अबलोकन यथार्थ है, यथार्थ ही स्नेह है, स्नेह ही साहित्यिक सहकारिता हैजिसमें स्वार्थ का तो नामोनिशान ही नहीं है और वह हैं पंडित सुरेश नीरव। जिधर देखो उधर ही पंडित सुरेश नीरव। जय नीरव। आपको मेरे पालागन । पुनः आप सबको नव वर्ष २०११ की शुभ मंगलकामनाएँ ।
भगवान सिंह हंस
एम -५७ ब्रह्मपुरी दिल्ली-११००५३
एम-९०१३४५६९४९
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