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Monday, December 13, 2010

सच बोलने में दिमाग की जरूरत कहां होती है।


झूठ की अकादमी व्यंग्य पठा. मजा आ गया। इन पंक्तियों के लिए बधाई-
अब आप सार्वजनिकरूप से किसी को भी झूठा कह सकते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि जिसे आप झूठा कहना चाहते हैं,उसे उसके सामने ही क्या सारी पब्लिक के सामने आप झूठा कह सकते हैं। और मज़ा यह कि पब्लिक और वह प्राणी जिसे आप झूठा कहें दोनों अति प्रसन्न। पब्लिक इस बात पर खुश कि इतना दुस्साहस तो किसीने हंसते-हंसते कर के दिखा दिया। सीधी-सी बात है- आप जिसे झूठा कहना चाहते हैं बस आपको पूरी विनम्रता के साथ उसे इतना ही तो कहना है कि अमुकजी-जैसा विद्वान मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा। और विद्वान तो चलो बहुत ढ़ूंढ़ने पर इत्तफाक से एक-आध कहीं मिल भी जाए मगर हमारे आदरणीय तो महाविद्वान हैं। जैसे ब्राह्मणों में महाब्राह्मण होते हैं। कुछ-कुछ उसी गोत्र के कानकाटू महाविद्वान। विद्वान हैं तो दिमाग भी ये अब्बल दर्जे का ही रखते हैं। और जब दिमाग है तो क्यों न उसे झूठ बोलने-जैसे रचनात्मक कार्य में खर्च किया जाए। सच बोलने में तो वैसे भी दिमाग की जरूरत कहां होती है। इसीलिए तो गधे कभी झूठ नहीं बोलते। गधे जो ठहरे। बिना दिमाग के निरीह प्राणी। आदमी शान से झूठ बोलता है क्योंकि उसके पास आला दर्जे का दिमाग है। हां, ये बात दीगर है कि जब कभी आदमी का दिमाग खराब हो जाता है तो वो भी सच बोलने-जैसी हरकत कर बैठता है। मगर जैसे ही उसे अपनी गलती का एहसास होता है,वो पछताता है। बार-बार अपनी गलती,अपनी मूर्खता को कोसता है। धिक्कारता है अपने को कि आदमी होकर क्या जरूरत थी उसे सच बोलने की। वह ईश्वर के आगे अपने दोनों कान पकड़कर माफी मांगता है कि अनजाने में मुझसे पाप हो गया है,मुझे माफ कर देना प्रभु। आप तो परम दयालु हो। आइंदा ऐसी गलती नहीं होगी। आपकी कसम खा नहीं सकता क्योंकि वो तो मैं झूठ बोलते समय ही खाता हूं। मगर इस वक्त मजबूरी में मुझे सच बोलना पड़ रहा है। एक चमचे की मस्केबाजी से प्रसन्न अफसर की तरह भगवान भी भक्त की हाईक्वालिटी की प्रार्थना से पसीज जाते हैं। और फिर भक्त सतर्कतापूर्वक झूठे मुंह भी कभी सच नहीं बोलता है। उसे भगवान से पंगा लेना है क्या। अगर भगवान को उससे सच ही बुलवाना होता तो उसे दिमाग ही क्यों देते। अब वो हमेशा दिमाग लगाकर ही दिमाग का उपयोग करेगा।
मुकेश परमार
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