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Wednesday, January 5, 2011

बुझ गया अब हमारे मन का आकाश है


बोडो कविता-
मुझे याद है अब भी
मूलः स्वर्ण प्रभा चैनारी
अनुवादः सुरेश नीरव

 मुझे याद है अब भी वह दिन
जिस दिन अलसाई थी मैं विद्यालय जाने को
स्लेट,पैंसिल अच्छे नहीं हैं,बार-बार शिकायत की थी मैंने मां से
और बच्चों की चिल्ल-पौं और काम में व्यस्त मां ने तब
जड़ दिए थे दो डंडे मुझमें
मैं रोने लगी थी और तब मुझे रोता देखकर
फफकर-फफकर रोने लगी थी मेरी मां भी
तब नानी ने मुझे गोद में उठाया था
रो, मत बिटिया कहकर दुलराया था
समझाया-बुझाया था
बोली थी  नानी  कि तुझे सुनाउंगी रात में अच्छी-सी कहानी
मुझे आज भी याद है बारिश के मौसम की वो सुहानी रात
जब आंगन में चटाई बिछाकर हम भाई-बहन सब लेटे थे
 आसमान में बिखरे थे तारे
और हवा में गूंज रही थी गेगेर-गेगेर आहट
तांबूल पत्तों की सरसराहट
और तब सुना रही थीं नानी
हमें ऊंचे आसमान की कहानी,पगले तारे की कहानी
जिसे सुनकर आकाश में उड़ने लगा था हमारा चंचल मन
मन आकाश हो गया था,एक अंहिंसात्मक खामोशी से भरा आकाश
जो याद बनकर आज भी सुरक्षित है मेरे मन में
मुझे आज भी याद है वैशाख महीने की वो घटना
जिस दिन आंधियों ने तोड़ डाला था मेरे घर को
और फिर गांव के बुजुर्गों ने एक साथ मिलकर उसे बांध दिया था दुबारा
मुझे याद है कि कैसे बीमारी के कारण मर गए दोनों बैलों के बाद
धान की अधूरी रह गई  जुताई को हल में बैल की जगह जुतकर
गांववालों ने हमारे खेत में धान बोया था,अधूरे काम को सदभाव से संजोया था
मगर अतीत के ये दृश्य आज सिर्फ मधुर स्मृतियां भर हैं
 क्योंकि अब वर्षा ऋतु की रातों में नहीं सुनाती कोई नानी
अपने छोटे बच्चों को कहानी
जिसे सुनकर बच्चे देखने लगें नन्ही आंखों में आसमान के सपने
अब कोई नहीं आता किसी का टूटा घर बनाने को
अब नहीं जुतते बैल की जगह हल में लोग
किसी के खेत को जोतने के लिए
अब खयाल सबके अपने हैं, जहां सिर्फ अपने घर के सपने हैं
अब लोग बड़े हो रहे हैं,सामनेवाले को रौंदकर खड़े हो रहे हैं
इसलिए बुझ गई है प्यास की चिंगारी संसार में
बुझा-बुझा-सा आकाश है
इसलिए बुझ गया अब हमारे मन का आकाश है।



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