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Tuesday, January 4, 2011

एक कविता " बची खुची ख़ुशी "

जब हम बड़े हुए
अब याद नहीं
किस कक्षा में पास हुए
तब देखी
माँ के चेहरे पर अजब ख़ुशी

जब हम युवा हुए
घर लौटे जोड़े से
माँ फूली नहीं समाई
लगा कि आंधी खुशियों की आई
घर-आँगन ,भीतर बाहर
सब के सब महके महके
भइया भाभी चाचा चाची
बहना बूआ बच्चे कच्चे
सब के सब चहके चहके
जब कंगना की रसम हुई
तब देखी
माँ के चेहरे पर गज़ब ख़ुशी

जब हम थोड़ा और बढे
गुणा भाग में धंसे
अम्बार लगे धन के
दूर कहीं नभ से
हम पर देव हँसे
पर थोड़े से अंतराल में
साड़ी उमर गई
प्रखर धुप जीवन की
जाने कब सुरमई हुई
फिर धीरे धीरे चुपके चुपके
उतरी आँगन सांझ
अंतर कलह पी गई रौनक
खुशियाँ हो गईं बाँझ
आनन् फानन चौड़े आँगन
होने लगी चिनाई
सूनी आँखों अम्मा ताके
जबरन रोक रुलाई
कटे पेढ़ से घर के मुखिया
बैठे द्वार अकेले
टाक रहे सूने अम्बर में
विगत काल के मेले
एक आस पर अब तक जीवित
ना जाने कब आते जाते
किसी राह में फिर मिल जाए
बची खुची वह गज़ब ख़ुशी
बी एल गौड़
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