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Tuesday, January 4, 2011

प्रशांत और दर्शन ,





एक अद्भुत दर्शन की अनुभूति इस कलियुग में कोई बिरला ही करा पाता है या कोई मजा हुआ ही संत, फकीर, गुरु या योगी जिसने उस पंथ की माटी का तिलक अपने माथे पर लगाया है और अपने अंतर्मन से ध्यानमय उपासना की है , अपनी पहुँच पर सफल होने का अनुभव दर्शा पाता है। आप बांये इस तस्बीर का अबलोकन कीजिए। ये कौन से संत या फकीर या गुरु या योगी हैं, विचार कीजिए । इस तस्बीर के चारों ओर जो घेरा बना है वह क्या है। सोचिए। अनुभव या सोच आपका। मुझे तो ऐसा लगता है कि जरूर ये कोई महान आत्मा है जो अपने को सर्व धर्म समभाव के घेरे के मध्य में प्रतिस्थापित किए हुए है। ये बारह धर्मचिन्ह ही नहीं बल्कि बारह ज्योतिर्लिंगों का बारह राशियों में बारहों मास यथार्थ प्रेम के द्योतक कड़े हैं जिनमें सच्ची आत्मा बैठी हुई है। इस महान या दिव्य विभूति में प्रेम का कैसा आकर्षण है , प्रेम का कैसा चुम्बकत्व है जो बिन बांधे धर्म की ये प्रेमी कड़ियाँ अपना दिग्दर्शन करा रही हैं कि सभी धर्मों में प्रेम ही उभयनिष्ट है और वही यथार्थ है और यथार्थ ही सत्य है एवं जो सत्य है वही प्रशांत है और प्रशांत है वही दर्शन है। जिसका दिग्दर्शन कराने वाले और कोई नहीं सिर्फ श्री प्रशांत योगीजी ही हैं जो सर्व धर्म समभाव में प्रेम का, सिर्फ प्रेम का यथार्थ दर्शन समय-समय पर करा रहे हैं। उससे हमें एक अद्भुत ज्ञान मिल रहा है। आपको मेरे प्रेम।
भगवान सिंह हंस
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