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Thursday, January 6, 2011

खतरनाक आदमी हैं प्रशांत योगी

ब्लॉग पर मैंने प्रशांत योगीजी को सदस्य बनाकर लगता है बहुत बड़ी गलती की है। वो जो कह रहे हैं उसका इनर करेंट आदमी को अधार्मिक बनाने का एक सोचा-समझा प्रयास है। शायद वे साधु के वेश में एक क्रांतिकारी है जो सोए हुए समाज में बगावत की बारूद बिछाने का काम कर रहे हैं। भले ही उनकी पोस्ट आध्यात्मिक लगती हो मगर उसका मंथन करने के बाद मुझे यकीन हो गया है कि वो धार्मिक गुरू कम एक बगावती या इंकलाबी ज्यादा हैं। ऐसा ही कारनामा कबीर ने करने की कोशिश की थी। मंसूर ने भी की थी। बहुत दिनों बाद फिर ओशो ने की थी। फिर एक लंबा अंतराल आ गया। समाज सो गया। मुझसे लोगों ने कहा आप कवि हैं सोए हुए समाज को उठाइए। जगाइए। मैंने कहा ये गलती भगतसिंह ने की थी,बिस्मिल ने की थी। चंद्रशेखर आजाद ने की थी। समाज दृष्टाभाव से देखता रहा। इन कीमती लोगों को फांसी पर लटका दिया गया। साक्षी भाव का बहुत महत्व है। सारा देश एक दर्शक दीर्धा ही बन गया है। आदमी सड़क पर घायल पड़ा हो कोई मदद नहीं करता। साक्षी भाव से देखते रहते हैं लोग। सब बड़े धार्मिक हैं। लड़की से बलात्कार चौराहे पर हो जाता है सब एक टीवी सीरियल की तरह देखते रहते हैं। यही प्राकृतिक मानव है। यही उसकी मूल प्रकृति है। वह यदि सेक्स को श्रम समझता है तो बड़े आदमी के अंदाज में इस काम के लिए भी मजदूर ऱख लेता है। चाहे उसका रूप रोबोट ही हो। और अगर सेक्स को आनंद समझता है तो मजदूरिन को भी नहीं छोड़ता। फिर कैसे आदमी को  आप अप्राकृतिक कहते हैं। मूलतः तो आदमी एक आदिम जानवर ही है। शराफत के मुखौटे के टूटते ही उसका असली  चेहरा सामने आता है। यही उसकी प्रकृति है। प्रकृति का अर्थ है- स्वभाव। इस आदिम स्वभाव को जिसने ललकारा वही दुश्मन हो गया समाज का, सत्ता का। आप आदमी को उसकी प्रकृति मत बताइए। आप आदमी को आईना दिखा रहे हैं। बंदर को आईना दिखाने का मतलब मालुम है आपको। आप अच्छे खासे चल रहे जंगल राज में अव्यवस्था पैदा करने की साजिश करते् हैं। आप हैं क्या। आप के पास कितने गुंडे हैं। कितना काला धन है आपके पास। नहीं है तो फालतू में लोगों को मत बरगलाइए। हमारे साथ रहना है तो एक शरीफ आदमी की तरह हमारे साथ आइए। कायरता का सम्मानित नाम है-शराफत। हम शरीफ लोग हैं आप अपनी दुकान कहीं और लगाइए। जयहिंद..
पंडित सुरेश नीरव
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