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Tuesday, February 1, 2011

मुक्तक


आज ब्लॉग देखा कुछ नया नहीं था| मेरी ग़ज़ल जो ब्लॉग पर पोस्ट हुई है, उसमें कुछ मुद्रण-त्रुटियाँ हैं| कृपया उन्हें यूँ सुधार कर पढ़ें| मतले के बाद दूसरे शेर की पहली पंक्ति यूँ पढ़े-

तू अज़मतों पे अपनी एतबार करके देख,

और चौथे शेर को यूँ पढ़े

उनका, जो तेरे हक़ पे खेमे गाड़ रहें हैं,

बिखरेगा ताम-झाम, ज़रा आंख तो उठा!

हंस जी के भरत-चरित्र काव्य पर शोध कार्य हो रहा है यह जान कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई, हार्दिक बधाई|

कुछ रुबाइयाँ

है अभी ताव मुझमें और गम उठाने की;

कोशिशें कर, तू मुझे और अजमाने की|

ये तेरी जिद कि मेरी आंख में आंसू देखे;

ठान ली मैंने भी हर हाल मुस्कराने की||

मेरे दिल को जो चुभें, तीर बनाकर देखो;

दर्द को तुम मेरी तकदीर बनाकर देखो|

मेरे आज़ाद खयालों को बांधना चाहो;

जाओ, तुम कैसी भी जंगीर बनाकर देखो|

क्या फ़रेबो ज़ुल्म को अच्छा कहा करूँ;

क्या अब सुगलाती रेत को दरिया कहा करूँ!

इंसान से गायब हुए, इंसान के आमाल;

क्या अब मधु हैवान को इंसां कहा करूँ!

मुर्शिदों का एक सा होता नसीब;

ढो रहे, हम भी अपना सलीब|

दोस्त मिलता आज ढूंढे से नहीं;

कल नहीं होगा कोई अपना रकीब|

डॉ. मधु चतुर्वेदी

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