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Friday, February 11, 2011

डैडी घर लौट आओ कोई कुछ नहीं कहेगा



हे मेरे गुमशुदा पिताजी...
मुझे गोद लेने के बाद आप किस बिल में बिला गए कुछ पता ही नहीं चल रहा है। मैं आपको जगह-जगह सूंघ-सूंघकर ढूंढ़ कर थक गया हूं। अगर किसी रूपसी के काले जादू में गिरफ्तार होकर आप किसी गली में हनीमून मना रहे हों तो उसे तुरंत केंसिल करके घर वापस आ जाओ आपसे कोई कुछ नहीं कहेगा। मैं हूं न... आपके चले जाने से मुझे अब ब्लॉग पर ज्यादा लिखना पड़ रहा है। डरता हूं कि कहीं लोग मुझे इंटलैक्चुअल न समझ बैठें। मैं जन्म से ही काफी इज्जतदार प्राणी हूं। ये अपमान कहां बर्दाश्त कर पाऊंगा। और बुद्धजीवी बनकर कौन-सी मुझे किसी सरकारी दुकान की कुर्सी हथियानी है। माना की हम कुत्ते हैं पर इतने कुत्ते भी नहीं। अपना भी कोई स्वाभिमान है। आखिर पुत्र किसके हैं। मुझे नहीं मालुम था मगर जब से आपने गोद लेलिया मुझे अपने डैडी का तो पता चल ही गया। वरना बड़ा अनाथ था। आपका स्मरण करते ही लपलपाके स्वाभिमान मुझमें जाग जाता है। मेरी आंखें लाल और पूंछ और अकड़कर टेढ़ी हो जाती है। सब आपके दिए संस्कार हैं। इसलिए आपसे मेरी हार्दिक भौं-भौं है कि आप फौरन से पेश्तर घर वापस लौट आएं। कोई आपसे कुछ नहीं कहेगा।
आपका कटखना सपूत
इशु
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