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Saturday, February 12, 2011

videsh yaatraa

प्रिय मित्रो ! मैं २१ फ़रवरी तक विदेश में रहूँगा ,तब तक के लिए अलविदा और एक कविता जो अभी लिखी है
वह कुछ इस तरह है :-
नया गीत
पुरवा हो या पछवा हो
या हो फिर कोई और हवा
जाने किस जंगल से आती
ढोकर लाती दर्द नया |

अब यह बैरी तेज पवन
आता करता सनन सनन
मन की बंजर धरती पर
आकर करता नया खनन
अब यह पागल मन मेरा
रच ना पाता गीत नया |

जब से पछवा तेज हुई
खोई संध्या swarnmai
जाने सपने कहाँ गए
सपनों बिन क्या रात नई
सोचा करता मैं गुमसुम
ढूँढूं चलकर नया पता |

नए पते पर पीपल हो
गंगा करती कल कल हो
एक अदद हो मनभावन
पुरवा धीरे चलती हो
तब ही संभव होगा यह
रच पाउँगा गीत नया |
बी एल गौड़
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