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Sunday, March 27, 2011

इतवारी चिच्छी


आज का चिट्ठा-
 आज ब्लॉग पर भगवानसिंह हंसजी की ग़ज़ल पढ़ी। महाकाव्य भरत-चरित के सृजक के लिए यह एक सुखद और आंनदकारी परिवर्तन है। और साथ ही एक नया प्रयोग भी। वह जो भी लिखते हैं आत्मा से लिखते हैं और खूब डूबकर लिखते हैं। बधाई..
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प्रोफेसर ए.वी.हंस के सूत्रात्मक कथन व्यावहारिक हैं और प्रेरक भी। जो लोग हिंदी नहीं जानते उन्हें अंग्रेजी के जरिए उन्होंने अपनी बात कही है। बढ़िया प्रयोग है।
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श्री प्रशांत योगीजी ने मुझे इस मृत्युलोक के रंगमंच में भगवान बनाने का जो गंभीर कृत्य किया है उसे देखकर मैं हतप्रभ हूं। और विस्मित-चकित भी। वे ऐसी यौगिक क्रियाएं करते रहते हैं। सर्व शक्तिमान हैं,हमारे.. योगीजी।
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नित्यानंद तुषारजी की ग़ज़ल बहुत ही बढ़िया है। हर शेर शेरियत का शेर है। उन्हें ईश्वर ऐसे ही लिखते रहने की प्रेऱणा देता रहे..जयलोक मंगल..
पंडित सुरेश नीरव
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