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Friday, March 4, 2011

ये कैसे कैसे रंग दिखाती है ज़िन्दगी

ये कैसे कैसे रंग दिखाती है ज़िन्दगी
जीने के अजब ढंग सिखाती है ज़िन्दगी।

सुनते ही जिन को आँख से आंसू निकल पड़ें
अशआर हमें ऐसे सुनाती है ज़िन्दगी।

पल भर में गिराती है कभी आसमान से
पल भर में कभी ऊंचा उठाती है ज़िन्दगी।

ख़ुश हों तो हमें पल में हंसाती है ज़िन्दगी
अपने पे अगर आए रुलाती है ज़िन्दगी।

मक़बूल यही शेर तो है हासिले-ग़ज़ल
होठों में तिनका दाब बुलाती है ज़िन्दगी।
मृगेन्द्र मक़बूल
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