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Thursday, April 7, 2011

मैं थी एक उन्मुक्त चिड़िया

तीन दिन से नियमित ब्लॉग देख रही हूँ किन्तु न तो कोई प्रतिक्रिया दे सकी न ही अपनी उपस्थिति करा सकी अत: आज सभी कुछ इक्कठा सुजाता मिश्रा के गीत “अब पथ यही है” ने खासा प्रभावित किया सुरेश ठाकुर का गीत भी बहुत सुन्दर बन पड़ा है विशेष रूप से ये पंक्तिया - “तोड़ दो वह रीति जो अनुराग को अपराध माने, प्यार को जो भावनाओं का क्षणिक उन्माद माने” इसके अतिरिक्त चेतन पवार व पंकज अंगार की गज़ले भी खूबसूरत हैं पंडित जी भी अपनी तीन रचनाओं के साथ शोभायमान हैं हंस जी का लेख भी प्रभावी है नीलम जी भी प्रतिक्रिया के साथ ही सही उपस्थित हैं, अच्छा लगा ब्लॉग का स्तर दिन दूना रात चौगुना इसी तरह बढता रहे ऐसी मेरी शुभकामना है अपनी एक छंद मुक्त रचना से उपस्थिति दर्ज करा रही हूँ मैं थी एक उन्मुक्त चिड़िया, तुमने क़तर डाले मेरे पंख – ताकि, अपनी अनन्त आकांक्षाओं के आकाश में जन तुम दिशाहीन होकर उड़ो, तो मैं तुम्हारा पीछा न कर सकूं. मैंने ढूंढ लिया पिंजरे में ही अपना आकाश! सीमित किन्तु संतृप्त! मेरा नितान्त मेरा!! और तुम, असीम आकाश में उड़ते हुए, पाते रहे अनन्त भटकाव. परिणाम – मैं वंचित किन्तु तृप्त! तुम सर्वभोगी किन्तु अतृप्त!! मैं थी एक अल्हड़ गाय, तुमने बांध दी मेरे पैरों में मजबूत रस्सियां – ताकि अपनी अन्धी वासनाओं के घनघोर जंगल में, जब तुम छुट्टे बैल की तरह दौड़ो – तो मैं तुम्हें पकड़ न सकूं! तुम रहे दौड़ते मैं रही स्थिर इसीलिए अविजित; क्योंकि जो दौड़ता है वही ठोकर खाता है अपने अंधे स्वार्थ हित जहां-तहां सिर झुकाता है. अत: मैं हूँ शांत, निरुद्वेग, निर्भीक, और तुम अशांत उद्वेलित सशंक. मैं थी एक चंचल हिरणी – तुमने किया मुझे शरविद्ध – मेरी नाभि में स्थित कस्तूरी के लिए मैं अपना कोष लुटाकर भी – रही पूर्ण समृद्ध, क्योंकि जो कुछ मुझसे छीना गया – वह मेरा नैसर्गिक रूप से मेरा अपना था- मैंने कहीं से पाया नहीं था और तुम मेरा कोष लूटकर भी – रहे अकिंचन के अकिंचन, क्योंकि जो कुछ तुमने मुझसे छीना, वह तुम्हारा कभी नहीं था. तो आओ आज मिलकर आकलन करें कि क्या श्रेय है? मेरा मुठ्ठी भर आकाश, या तुम्हारा अनन्त भटकाव? मेरी शांत, निरुद्वेग निर्भीकता ? या तुम्हारा अशांत, सशंक उद्वेलन?? मेरी नैसर्गिक समृद्धि या तुम्हारी लोलुप अकिंचनता?? तो जब भी अनुकूल निर्णय ले सको – मेरी और आना! मेरा शांत, निर्भीक, समृद्ध आकाश – तुम्हारी संतुष्ट उड़ान हेतु सदैव प्रस्तुत है! डॉ. मधु चतुर्वेदी
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