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Friday, April 15, 2011

बृहद भरत चरित्र महाकाव्य

बृहद भरत चरित्र महाकाव्य के कुछ प्रसंग आपके दर्शनार्थ-

चंद्रकांता में श्री भरत

भरत ज्ञान जस  नहि जन काहू. शिष्ट सहज सरल महाबाहू.
गन्धर्व देश जीत निहारा. प्रभु   को   दिया     शुभ    समाचारा.
भरत का सा संज्ञान किसी जन में नहीं है. भरत शिष्ट, सहज, सरल और महाबाहु हैं. उन्होंने गन्धर्वदेश को जीतने का शुभ समाचार प्रभु श्रीराम को दिया.
राघवेन्द्र अन्तः उल्लासे. उत्सुक भरत लखन से भाषे.
ये अंगद और चंद्र्केतू.  वयस्क,   इन्हें   दो राज्यसेतू.
सुनकर राघवेन्द्र अन्तः में बहुत प्रसन्न हुए और उत्सुक होकर भरत तथा लक्ष्मण से बोले, ये लक्ष्मण के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु हैं. अब ये भी वयस्क हो गए हैं. इन्हें भी राज्यसेतु दिया जाए.
बल पराक्रमी दोउ कुमारा.   संभालेंगे स्वराज्य भारा.
इनका करूँ राज्यभिशेका. धनुर्धर वीर au,  बाहू  नेका,
दोनों राजकुमार बलवान और पराक्रमी हैं. अब वे अपने-अपने राज्य का भार संभाल लेंगे. मैं उनका राज्याभिषेक करूँ. ये धनुर्धर, वीर और बहुत नेक हैं.
सौम्य! ऐसा सु देश बताना. जहाँ न हो संताप निदाना.
हम भी न बने जन अपराधी . न हो वहां रोग और व्याधी.
राम ने भरत से कहा, सौम्य! ऐसा कोई सुन्दर देश बताओ जहाँ बाद में कोई दुःख न हो और हम बी जन अपराधी  न बनें. और वहां कोई रोग तथा व्याधि भी न हो.
ऐसा   सुन   रघुनाथ से, भाषे भरत विचार.
कारूपथ एक देश है, सुलभहि सभी प्रकार.
श्रीराम से ऐसा सुनकर भरतजी विचार करके बोले, कारूपथ एक देश है और वह सभी प्रकार से सुलभ है.
निर्भय रहि तहि राजकुमारा. आरोग्यवर्धक सब प्रकारा.
सुरक्षित सीम है चहुँ ओरा. संपन्न शांत न कहीं शोरा.
वहाँ दोनों राजकुमार निर्भय रहेंगे. वह देश सभी प्रकार से आरोग्यवर्धक है. उसकी सीमा चारों ओर से सुरक्षित हैं. और सभी प्रकार से संपन्न व शांत  है और कहीं पर शोर नहीं है.
भरत बातहि नाथ स्वीकारा. करो कारूपथ पर अधिकरा.
तहाँ दो नगर रम्य बसाओ . दोनों सुतों को नृप बनाओ .
नाथ ने भरतजी की बात स्वीकार की और कहा, कारूपथ पर अधिकार करो और वहाँ दो सुन्दर नगर बसाओ. दोनों पुत्रों को उन नगरों के रजा बनाओ.
भरत ने बात अंगीकारा. कारूपथ पथ कीन्ह अधिकारा.
अंगदीपा  सुपुरी बसायी. सुन्दर सुरक्षित चहुँ बनायी .
भरत ने राम की बात स्वीकार कर ली और कारूपथ पर अधिकार कर लिया. भरतजी वहाँ  अंगदीपा नामक सुन्दर  नगर बसाया. और उस नगर को चारों से अनुपम और सुरक्षित बनाया
दूसर बसायी चन्द्रकांता . अमरपुरी सम दिव्य नितान्ता.
चन्द्रकेतु वपु मल्ल समाना. मल्ल देश   में  पुरी महाना.
और दूसरा नगर चंद्रकांता नाम का बसाया. वह नगर अमरपुरी के समान सुन्दर है. कुमार चंद्रकेतु का शरीर मल्ल के समान है और मल्लदेश में वह महान पुरी है.
 दोउ   का    कर   राज्यभिशेका. पूरण   हुई   बात  प्रभु नेका.
भरत लखन प्रफुल्लित अपारा. अभिषेक मुक्ति सोहि कुमारा. 
भरतजी ने इस प्रकार दोनों कुमारों का राज्याभिषेक किया. भरतजी ने प्रभुश्रीराम की नेक बात पूर्ण की. भरत और लक्ष्मण बहुत प्रसन्न हैं. अभिषेक से मुक्त होकर दोनों कुमार और भी  सुशोभित  हुए. 
अंगद साथ लखनहि पठाया. भरत को चंद्रकेतु गहाया.
सुद्रढ़ करो राज्य सब ओरा. संभालें कुमार चहुँ छोरा.
राम ने अंगद के साथ लक्ष्मण को और चंद्रकेतु के साथ भरत को भेजा. राम ने कहा कि सब तरह से इनके राज्य को सुद्रढ़ बनाओ जिससे ये कुमार apne-apne   राज्य को चारों छोरों से अच्छी तरह से संभाल लें. 
पश्चिम दिशा  में अंगद, उत्तर जू चन्द्रकेतु.
चंद्रकांता    नगरी   में , भरत श्री   धर्मसेतु
पश्चिम देश में अंगद और उत्तर देश में चन्द्रकेतु. और चंद्रकांता नगरी में श्रीभरत हैं.

महाकाव्य रचनाकार 
   ९०१३४५६९४९  


प्रस्तुति- योगेश विकास 






   










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