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Saturday, April 9, 2011

बृहद भरत चरित्र महाकाव्य

बृहद भरत चरित्र महाकाव्य के कुछ  प्रसंग  आपके सतानंद हेतु -

तिहार  हितकर बात ही  जु स्वामी. नहीं तो विनाश धरनि घामी.
मैं आपकी विजयश्री   चाहूँ.    इसबार          भ्रातप्रेम          सराहूँ.

हे स्वामी! मैं आपके हित की बात कह रही हूँ नहीं तो इस  तपती ताप में धरनि पर विनाश हो जायेगा. मैं आपकी विजयश्री चाहती हूँ. इस  बार मैं भ्रात प्रेम   की सराहना करती हूँ . 

चंद्रमुखी तारा फटकारी . गर्जन कर यों बात उचारी.
भाई नहीं, वह है अरि मेरा. ललकारा जस वीर घनेरा .

बालि ने अपनी चंद्रमुखी-सी तारा पटरानी फटकारी और गर्जनकर  इस  प्रकार  कहा, वह (सुग्रीव) मेरा भाई नहीं, मेरा दुश्मन है. उसने ऐसे ललकारा है जैसे कोई  बड़ा वीर हो. 

राम बात सही, नहिं विशादा. धर्मज्ञ धीरमय आह्लाद.
वह पाप का क्यों बने भागी. कर्त्तव्यशील राम, अभागी.

राम की बात ठीक है. मुझे उससे कोई विषाद नहीं है. राम धर्मज्ञ धैर्यशील और आनंद का देने वाला है. वह पाप का भागी क्यों बनेगा. राम कर्त्तव्यशील है परन्तु वह अभागा है. भाग्य का हेटा है

 दुरात्मा को न सह सकूँ. सुन तारा मम बात.
 सौगंध मुझे प्राण की, उसको मारूँ  लात.

तारा! मेरी बात सुन. मैं दुरात्मा को सहन नहीं करूंगा. मैं अपने प्राणों की सौगंध खाता हूँ, उसको मैं लात मारूंगा.

बाली ने सुग्रीव निहारा. लंगोट बांध किया प्रहारा.
घूँसा लात मुक्का जमाये. सुग्रीव भी बहु रोष  दिखाए.

बाली ने सुग्रीव को देखा.  और  लंगोट बांधकर प्रहार किया. बाली ने सुग्रीव के घूँसा,  लात और मुक्का खूब जमाये. सुग्रीव ने भी खूब रोष दिखाया.  

इंद्रपुत्र बाली घबराया. सुग्रीव ने साल दिखलाया.
साल तरु से बाली के घावा. सुग्रीव ने बोला कटु धावा.

इंद्रपुत्र बाली घबराया. सुग्रीव ने सालतरु दिखाया.  सुग्रीव ने कटु धावा बोल दिया और सालतरु के मारने से उस बाली के घाव हो गए.

घोर  युद्ध मध्य सके बीरा. महापराक्रमी दो शरीरा.
सुग्रीव शक्ति क्षीण निदाना. बाली का मुक्का संधाना.

सगे भाइयों के मध्य घोर युद्ध हो रहा है. दोनों ही महापराक्रमी हैं. अंत में सुग्रीव की शक्ति क्षीण हो गई. बाली ने उस पर  मुक्का का संधान किया. 

सुग्रीव राम ओर निहारा. राम की लाल आँख अंगारा.
वृक्ष आड़ से राम लखाए. बाली पर विष वाण चलाए.

सुग्रीव ने राम की ओर देखा राम की आँख लाल अंगारा हो गईं. वृक्ष की आड़ से राम ने देखा और बाली पर विष-वाण चल दिए.

श्रीहीन बाली धराशायी. रक्त की धार धरनि बहायी.
कराहते बाली यों उचारा. राम! मुझे धोखे से मारा. 

बाली श्रीहीन होकर धराशायी हो गया. उसके रक्त धार धरती पर बहने लगी. कराहते हुए बाली इस  प्रकार बोला , राम! तुमने मुझे धोखे से मारा है. 


रचनाकार- भगवान सिंह हंस 
९०१३४५६९४९ 

प्रस्तुतकर्ता- योगेश 
  


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