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Tuesday, May 24, 2011

ज्ञान गीत

बलशाली का शासन संगत ही बस जब युग का दर्शन था
बेबस घुट रही कराहों की लय पर आंसू का नर्तन था।

तुम आतंकित होजाते थे, केवल मुंह ढक रो पाते थे।
अत्याचारी के कृत्यों पर आंसू भर भर रह जाते थे।

तुमको मैंने आदेश दिए तब समरभूमि के प्रांगण में
भर दिया ओज, भर दिया जोश, कंचन ,कविता में कण कण में ।

सूखे अधरों हंस पाना भी जब जन जन का संघर्षण था।
तब कविता मदिर विलास न थी, तब जन जन का कवि भूषण था ।

तब तलवारों से लिखा काव्य, भेंटा भारत के वीरों को ।
यह युगों युगों तक गूंजेगा जो गीत सुनाऊंगा तुमको ।

(क्रमशः)

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