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Sunday, May 29, 2011

लेखक ओंकारेश्वर पांडेय द संडे इंडियन के प्रबंध संपादक

इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन ने प्रकाशित किया 
शत्रु संपत्ति पर अंग्रेजी और हिंदी में पहली पुस्तक
एनमी प्रॉपर्टी एंड इंडियाज नेशनल इंटरेस्ट 
यानी 
शत्रु संपत्ति और राष्ट्रीय हित.
द्वितीय शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं पुनर्पुष्टिकरण) विधेयक 2010 इस समय संसद की स्थायी समिति के पास विचाराधीन पड़ा है. आखिर क्या है यूपीए सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत द्वितीय शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं पुनर्पुष्टिकरण) विधेयक 2010 ? क्या है शत्रु संपत्ति संबंधी मौजूदा कानून ? क्या होगा बदलाव का असर ?  दुनिया के अन्य देशों में क्या हैं शत्रु संपत्ति संबंधी कानून ? क्या हो रही है परदे के पीछे राजनीति ? किसको मिलेगा लाभ ? और कौन रहेगा नुकसान में ? द्वितीय शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं पुनर्पुष्टिकरण) विधेयक 2010 का स्याह सफेद सच जानने के लिए पढ़ें शत्रु संपत्ति  पर अंग्रेजी और हिंदी में यह पहली और विशेष पुस्तक, एनमी प्रॉपर्टी एंज इंडियाज नेशनल इंटरेस्ट (अंग्रेजी), एवं हिंदी में- शत्रु संपत्ति और राष्ट्रीय हित. जिसे इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन ने प्रकाशित किया है. इसके लेखक ओंकारेश्वर पांडेय द संडे इंडियन के प्रबंध संपादक ओर राष्ट्रीय सहारा के पूर्व संपादक हैं. उनकी पहली पुस्तक – घाटी में आतंक और कारगिल का विमोचन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने किया था. वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा इस पुस्तक के सह लेखक हैं.



आखिर कार मोहम्मद अली जिन्ना का मुंबई बंगला भारत ने उन्हें क्यों नहीं लौटाया? इसीलिए न कि बंटवारे के बाद जिन्ना भारत के घोषित दुश्मन हो गये थे? तो उनकी संपत्ति को शत्रु संपत्ति माना गया. और आखिरकार भारत सरकार ने उनका मुंबई का पॉश बंगला अधिग्रहित कर लिया. पर जिन्ना के खासमखास रहे महमूदाबाद के राजा आमिर अली खान के बेटे मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान उर्फ सुलेमान खान उर्फ सुलेमान मियां कैसे इतने सौभाग्यशाली निकले, जिनकी संपत्ति शत्रु संपत्ति होकर भी उन्हें वापस मिल गयी. क्या इसलिए कि उनके पक्ष में मुदकमा केन्द्र सरकार के मंत्री अपनी ही सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे थे. और क्या इसलिए भी कि जिन्ना के खास रहे और मुस्लिम लीग के कोषाध्याक्ष रहे सुलेमान मियां के पिता और महमूदाबाद के राजा आमिर अली खान के ताल्लुकात नेहरू खानदान और उनकी पार्टी कांग्रेस से भी उतने ही करीबी रहे हैं? भारत सरकार ने जिन्ना को शत्रु माना तो उनकी संपत्ति जब्त कर ली. उनके वारिसों को भी नहीं दी. पर जिन्ना के ही करीबी महमूदाबाद के राजा आमिर अली खान के बेटे सुलेमान मियां की शत्रु संपत्ति को अदालती फैसले के मुताबिक लौटाने का फैसला कर लिया. शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के तहत घोषित शत्रु संपत्ति कानूनन सुलेमान मियां की हो गयी. 32 सालों की कानूनी लड़ाई के बाद सरकार सर्वोच्च न्यायालय में हार गयी. और अदालत में सरकार को हराने में सत्तारूढ़ केन्द्र सरकार के आला नेताओं ने सुलेमान मियां का पूरा साथ दिया. सुलेमान मियां ने खुद को महमूदाबाद के राजा आमिर अली खान का कानूनी वारिस और भारतीय होने के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा जीत लिया. और सरकार ने भी उन्हीं मुस्लिम सांसदों के दबाव में आकर सुलेमान मियां को यह घोषित शत्रु संपत्ति देकर देश के बंटवारे में सहायक रहे और उसके कारण उस दरम्यान हुए भारी कत्लेआम के जिम्मेवार महमूदाबाद के राजा आमिर अली खान के परिवार को पुरस्कृत करने का काम किया है. ध्यान रहे कि  राजा महमूदाबाद की संपत्ति 50 हजार करोड़ से अधिक होने का अनुमान है.
यह ताजा उदाहरण है- एक देश में दो विधान का, और राष्ट्रहित को ताक पर रख कर मुस्लिम तुष्टीकरण का. 
सुलेमान मियां के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला वर्ष 2005 में आया था. इसके बाद से ही भारत में शत्रु संपत्ति के मुद्दे पर नया विवाद शुरू हो गया. दरअसल, इसी तरह हजारों करोड़ रुपये मूल्य की शत्रु संपत्ति भारत में है. तो इस फैसले के बाद हजारों अन्य मुकदमे देश भर में छोटी बड़ी अदालतों में दाखिल होने लगे. एक दिलचस्प मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में आया, जिसमें एक व्यक्ति ने एक तिहाई आगरा शहर पर और साथ ही ताजमहल पर भी हक का दावा कुछ दस्तावेजों समेत पेश किया. 300 वर्ष पुरानी संपत्ति का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने इस केस को खारिज तो कर दिया, पर याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इसी तरह के अनेक दावे रोज दाखिल होने लगे. पर चूंकि यह समस्या अदालत के फैसले से उपजी थी. इसलिए सबकी निगाहें केन्द्र सरकार पर टिकी थीं. पहले तो केन्द्र की संप्रग सरकार ने महमूदाबाद की ंपत्तियों को उसके उत्तराधिकारी को देने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को असंगत माना, और फैसले के अमल पर रोक के लिए सरकार जुलाई  2010 में पहला शत्रु संपत्ति अधिनियम संशोधन विधेयक लाई. तब यह विधेयक पूरी तरह से 1968 में लागू शत्रु संपत्ति अधिनियम कानून की मूल भावनाओं के अनुरूप था. उम्मीद थी कि इस संशोधन विधेयक से 1968 का कानून और मजबूत होगा और इससे राजा महमूदाबाद की हजारों करोड़ की संपत्तियों को कस्टोडियन के ही अंतर्गत रखा जा सकेगा. पर सरकार मुस्लिम सांसदों के दबाव में झुक गयी. और सरकार ने जिन्ना के उस साथी का साथ देने का फैसला कियाजिसके परिवार ने उस पाकिस्तानी मुस्लिम लीग का साथ दिया था, जिसने देश के बंटवारे से लेकर आजादी के दौरान लाखों भारतीयों के कत्लेआम को अंजाम देने में अहम भूमिका निभायी थीऔर इसीलिए जिसकी संपत्ति उस समय भारत की कांग्रेस सरकार ने शत्रु संपत्ति घोषित कर जब्त कर ली थी. जिसके बारे में अदालती फैसले को देश हित में बदलने के लिए पी चिदंबरम संशोधन अधिनियम लाएअब उसी को वापस मित्र संपत्ति बनाने के लिए मुस्लिम वोट बैंक के दबाव में ल्टी कार्रवाई की जा रही है।
यह मामला संसद के पिछले मानसून और फिर शीतकालीन सत्र में चर्चा के लिए आया. पहले पिछले साल जुलाई में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार  ने शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं पुनर्पुष्टिकरण) विधेयक 2010 लोकसभा में पेश किया. इस विधेयक का विभिन्न राजनीतिक दलों के मुस्लिम सांसदों ने विरोध किया, जिसका समाजवादी पार्टी, राजद, लोजपा और वाम दलों ने समर्थन किया. हालांकि सदन में चर्चा के लिए विधिवत इस विधेयक की बारी आने से पहले ही सत्र समाप्त हो गया. शीतकालीन सत्र में सरकार इस विधेयक को नये संशोधनों के साथ ले आयी. उम्मीद नहीं थी कि यूपीए सरकार मुस्लिम सांसदों के दबाव में इतनी जल्दी यू-टर्न ले लेगी. यूपीए सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत द्वितीय शत्रु संपत्ति (संशोधन एवं पुनर्पुष्टिकरण) विधेयक 2010 पूरी तरह से मुस्लिम सांसदों के दबाव में उनकी मांगों के अनुरूप तैयार किया गया है. इसमें राष्ट्रहित तो नहीं ही है बल्कि इससे राष्ट्र् विरोधी ताकतों का हौसला बढ़ेगा.
क्योंकि एक मूल सवाल यह है कि जब कोई भी व्यक्ति अपराध करके भाग जाता है, कानून की नजर में भगौड़ा हो जाता है, तो कानूनन उसकी संपत्ति की कुर्की जब्ती करने का प्रावधान है. ताकि उस पर यह मानसिक दबाव रहे कि वह अगर अपराध करके भाग जाता है तो इसका खामियाजा उनके परिवार को भुगतना पड़ सकता है. पूरी दुनिया में शत्रु संपत्ति से संबंधित कानून न्याय की इसी बुनियादी अवधारणा पर बने हैं. पाकिस्तान ने अपने देश में जब्त अरबों रूपये मूल्य की शत्रु संपत्तियों को बेच डाला. बांग्लादेश ने भारत के शत्रु राष्ट्र् ना होते हुए भी विस्थापितों आप्रवासियों की लाखों एकड़ जमीनें जब्त कर लीं. अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, फ्रांस समेत पूरी दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं मिलेगा जो भारत की तरह शत्रु संपत्ति को लौटाने के लिए संसद में विधेयक ले आये. स्वयं इंदिरा गांधी की सरकार ने सुलेमान मियां के परिवार से पुराने ताल्लुकात और तमाम दबावों के बाद भी अधिकतम 25 फीसदी संपत्ति ही सुलेमान मियां को देने को मंजूरी दी थी. पर अल्पसंख्यक नेताओं के दबाव और प्रभाव में चल रही केन्द्र की संप्रग सरकार राष्ट्रहित और राष्ट्रीय भावनाओं के सर्वथा विपरीत एक ऐसा कदम उठाने पर आमादा है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव देश की करीब एक लाख करोड़ रूपये मूल्य की संपत्ति पर पड़ेगा, जिससे राष्ट्र विरोधियों के मनोबल ऊंचे होंगे, शत्रु मुस्कुराएंगे, उनके हौसले बुलंद होंगे और देश का मनोबल टूटेगा.जरूरत इस बात की है कि सरकार इस मसले को भारत से पाकिस्तान चले गये उन नागरिकों की संपत्ति, जिन्हें शत्रु संपत्ति मानकर भारत सरकार ने जब्त कर लिया था, के दायरे तक सीमित न रख के एक ऐसा कानून बनाये जो सभी प्रकार की शत्रु संपत्तियों पर एक समान लागू हो सके. केन्द्र सरकार को इसमें कोई सांप्रदायिक अथवा तुष्टीकरण की नीति के बजाय एक वास्तविक राष्ट्रीय और धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण रखना चाहिए. भारत के तमाम आतंकवादी आज दूसरे देशों में शरण लेकर ऐश कर रहे हैं. क्या मुंबई बमकांड के दोषी दाऊद इब्राहिम जैसे राष्ट्रद्रोही तत्वों अथवा कश्मीर से लेके पूर्वोत्तर भारत के तमाम आतंकवादियों की संपूर्ण संपत्ति को शत्रु संपत्ति के दायरे में नहीं लाना चाहिए? संसद इस पर जो भी नया कानून बनाये, उसे इन सारे पहलुओं पर विस्तार से ध्यान देना चाहिए. ध्यान ये भी रहे कि पाकिस्तान ने विभाजन के बाद भारत आये तमाम लोगों की संपत्तियां एक समय के बाद शत्रु संपत्ति घोषित कर बेच डालीं. बांग्लादेश का जन्म भारत के सहयोग से हुआ था. उससे हमारे लिखित तौर पर 25 साल तक मैत्री संबंध रहे. आज भी हम उसे शत्रु राष्ट्रों की श्रेणी में नहीं रखते. लेकिन आश्चर्य जनक रूप से इसी बांग्लादेश के हु्क्मरानों ने वहां से भागकर भारत शरण लेने वाले लाखों हिंदुओं की लाखों एकड़ से ज्यादा जमीनें बेचने का फरमान जारी कर दिया. यूरोप, अमेरिका, ब्रिटेन, चीन आदि देशों का रूख शत्रु संपत्ति को लेकर दृढ़ और राषट्रीयता की भावना को सर्वोपरि रखकर बनाये गये हैं. भारत को भी इस मामले पर देश पहले का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए.  


पुस्तक प्रकाशक 
इण्डिया पालिसी फाउण्डेशन,
डी ५१
, हीज खास,
नयी दिल्ली ११००१६
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