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Wednesday, June 1, 2011

जीवन सनातन है


       आदरणीय पंडितजी,पालागन. मेरे जैसे अनभिग्य, अल्पग्य एवं जिज्ञासु का छोटा-सा प्रश्न और आप जैसे शब्दऋषि, महर्षि ,प्रग्य,  देश-विदेश में सुविख्यात कवि जिनके लिए व्यक्ति तो क्या धरा भी नमन करती है और प्रकृति अपनी सौरभता बटोरकर  दुलार करती है, अपनी रसभरी सुगंध से स्नेहती है, आकाश पुहुप वर्षा करके आपका सम्मान करता है , निशिकर  की शीतल यानी आनंदित छाँव में  मार्तंड अपनी अप्रतिम ज्योति डालकर फोकस करता है और बिम्ब बनाता है, सही अर्थों में यह आपकी सदविद्वता ही है जिसमें शाश्वत जीवन के मूर्त एवं अमूर्त बिम्ब आलोकित होते हैं ऐसे प्रग्य को मैं बार-बार नमन करता हूँ जिनके मुखारविन्दु से  मेरे प्रश्न का उत्तर सही मायने में मुझे  मिला. इसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूँ. मेरी जिज्ञासा को सीरक व संतुष्टि मिली. आपने कहा है - जीवन सनातन है. जीवन की कभी म्रत्यु नहीं होती. जीवन कभी मर  भी नहीं सकता क्योंकि म्रत्यु का कभी जन्म नहीं होता. जीवन काल से परे भी  है जिसे अमरत्व कहा जाता है. जो काल से परे है वही अम्रत्व है यही पंथ का अकाल है. अर्थात यही मोक्ष, निर्वाण,  कैवल्य और सद्चिदानंद है. म्रत्यु जीवन का मोड़ है , मंजिल नहीं. इसलिए जीवन म्रत्यु के पहले भी था और म्रत्यु के बाद भी रहेगा. जीवन सतत एवं  शाश्वत  है. आपकी विद्वता को पुनः पुनः मेरे नमन.

          
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