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Saturday, June 11, 2011


.आज रामप्रसाद बिस्मिल जी की याद् आ रही है। क्या विडंबना है कि ऐसे शहीदों की आवश्यकता मुझे आज भी महसूस हो रही है। कभी तो लगता है कि आज ऐसे राष्ट्रप्रेमियों की‌आवश्यकता तब से अधिक है। बिस्मिल ज़िन्दाबाद


मेरी नई पुस्तक 'सुनो मनु' की‌ समीक्षा श्री के पी सक्सेना 'दूसरे' ने लिखी है। और श्रीमती सरोजिनी कुलश्रेष्ठ ने भी यदि आपको रुचि हो तो पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणी भी दें। मुझे प्रसन्नता हीहोगी।
लिखी‌है।

चर्चित पुस्तक- सुनो मनु

लेखक-विश्वमोहन तिवारी, पूर्व एर वाइस मार्शल, नोएडा उ.प्र.

प्रकाशक- अमर सत्य प्रकाशन, प्रीत विहार, दिल्ली; मूल्य-225 रु0, संस्करण-2010

पुस्तक समीक्षा : के पी सक्सेना, 'दूसरे'

सुनो मनुः पिता के द्वारा युवा पुत्र में जीवन मूल्यों के सुसंस्कार ढालते अद्भुत पत्र।

आज के इस भोगवादी युग में युवावर्ग के समक्ष टीवी तथा इंटरनैट द्वारा 'प्रेरित' (!) नाना प्रकार के भोगवादी प्रलोभन, यौन विकर्षण, फ़िसलन आदि की समस्यायें हैं जो पहले नहीं थीं, और इसलिये मातापिता भी भ्रमित हो सकते हैं; उनका संतान से संवाद भी टूट सकता है। नवीन रंगीन माध्यम ने युवावर्ग को इस कदर सम्मोहित किया है कि उसे पश्चिमी भौतिक चकाचौंध में, पारंपरिक विवेक बौना प्रतीत होने लगा है। उसके समक्ष भोग की दानवी लिप्सा है जो आर्थिक उच्छृंखलता के साथ-साथ नैतिक दरिद्रता तथा कुसंस्कृति के भयानक अभिशाप की ओर उसे ढकेलती रहती है; फलस्वरूप समाज में अपराध बढ़ रहे हैं, दुख बढ़ रहे हैं। अपने भोग की लिप्सा की तुष्टि के लिए युवा Beg, buy borrow or steal और हत्या, जैसे जघन्य अपराधों तक को करने में नहीं हिचकता, तब क्या आश्चर्य कि बलात्कार ही नहीं‌ वरन 'गिरोह बलात्कार' हो रहे हैं।

पुस्तक 'सुनो मनु' में लेखक ने अपने युवा पुत्र को उसके उच्च शिक्षाकाल के दौरान छात्रावास में निवास करते समय पत्रों के माध्यम से आज के भोगवादी बाजार के पंक में फँस जाने के खतरों से मित्रवत सावधान किया है। इसमें पुत्र की सामान्य समस्याओं के हल के लिये लेखक जड़ों तक जाकर जीवन मूल्यों से जुड़े प्रश्नों पर चर्चा करता है। विद्वान लेखक ने पत्रों में विद्वत्ता न बघारते हुए तर्क संगति से आगे बढ़ते हुए न केवल सत् साहित्य का महत्व प्रतिपादित किया है अपितु साहित्य के आधारभूत मूल्यों को मानव जीवन के मूल्यों द्वारा सदा ही परिष्कृत एवं संरक्षित करने हेतु अनिवार्य बताया है। इन्हीं मानव मूल्यों से व्यक्ति की योग्यताओं, क्षमताओं एवं दक्षताओं की वृद्धि होती है और नम्रता, निर्भीकता तथा नियमित्ता के गुण विकसित होते हैं जो आगे चलकर जीवन में सादगी, सत्यनिष्ठा, स्नेह, संतोष, सेवा, सौहार्द, संयम, सदाचार, स्वावलंबन, स्वाध्यायी, सद्भाव, सामंजस्य, सहकार जैसे दिव्य गुणों का विकास करते है।

'सुनो मनु' में लेखक ने एक मनीषी, कवि, विचारक, चिंतक, दार्शनिक, खिलाड़ी, प्रकृति प्रेमी तथा आलोचक होने के नाते अपने युवा पुत्र में सुसंस्कार ढालने का सफल प्रयास किया है; तथा प्रगति के नाम पर आधुनिकता दिखाने की होड़ में पिज्जा, बर्गर, कोला, पॉप म्युजिक, ड्रिंक, डिस्को डांस की आड़ में राक्षसी भोग, विकृत सेक्स, खूंख्वार हिंसा की कुसंस्कृति के प्रति भी आगाह किया है, क्योंकि अब यह छुटपुट घटनाएं नहीं, वरन कैन्सर की तरह फ़ैल रही हैं। टीवी और पॉप म्यूज़िक उसे आधुनिकता के नाम पर क्षुद्रताओं में व्यस्त रख सोचने की क्षमता कम करते हैं।

अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि पिता बच्चों के द्वारा अपनी असंतुष्ट महात्वाकांक्षाओं को पूर्ण करता है। हो सकता है कि कुछ पिता ऐसा करते हों, किन्तु अधिकांश पिता तो अपनी समझ से पुत्र की भलाई के लिये ही उसे निस्वार्थ सलाह देते हैं। माता पिता से अधिक अपनी संतान का भला चाहने वाला, कम से कम भारत में, अन्य का होना बहुत मुश्किल है, टीवी और रंगीन माध्यम तो बिलकुल नहीं, यह तो अपना राक्षसी पेट भरने में ही लगे रहते हैं; इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि आज बच्चों को यही राक्षसी माध्यम मनोरंजन के बहाने जीवन मूल्य दे रहे हैं। क्या आश्चर्य कि आजकल बच्चों के 'हीरो' यही एक्टर, खिलाड़ी ही अधिकतर होते हैं; कोई वैज्ञानिक, साहित्यिक, कर्गिल में अपना बलिदान करने वाला सैनिक नहीं। लेखक ने एक जिम्मेदार और स्नेही पिता होने की भूमिका में रंगीन माध्यम द्वारा परोसी जा रही कुत्सित आधुनिकता को समझाते हुए भारतीय ऋषि परंपरा का आधुनिकता के साथ समन्वय करते हुए नैतिक, मानसिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विकास का मार्गदर्शन किया है, और जिसके द्वारा भारत को विश्व में सम्मानजनक स्थान बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहने का संदेश दिया है।

इस पत्राचार में एक और वैशिष्ट्य जो दृष्टिगत होता है वह यह है कि विद्वान लेखक ने अपनी विद्वत्ता या पिता होने के हक से पुत्र पर अपने विचारों को थोपने का किंचित भी लोभ नहीं किया वरन् पुत्र के विवेक को समृद्ध कर, उसे स्वयं ही अपने जीवन को जाँचने की सलाह दी है ताकि एक विकासशील युवा की तरह वह स्वयं निर्णय ले सके। ज्ञान और तर्क द्वारा यह समझाने का प्रयास किया गया है कि आखिर वास्तविक सुख भोगवाद में है या त्यागमय भोग में; सच्ची आधुनिकता एवं प्रगति वास्तव में क्या है ।

लेखक की यह पुस्तक संपूर्ण युवा वर्ग के साथ-साथ उनके माता पिता एवं अन्य अभिभावकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। भाषा शिल्प, शैली, विषयवस्तु, बोधगम्यता तथा शुभ संदेश के संप्रेषण में सक्षम यह संकलन उत्कृष्ट तो है ही महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की समुचित पात्रता रखता है। ऐसी अनुपम कृति प्रस्तुत करने के लिए लेखक को जितना भी सराहा जाय कम है। प्रकाशक भी उत्तम छपाई, कागज, जिल्द के लिये प्रशंसा के पात्र हैं, दृष्टव्य है कि मुद्रण की गलतियां नगण्य हैं।

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पुस्तक समीक्षा.- श्रीमती सरोजिनी कुलश्रेष्ठ

चर्चित पुस्तक- सुनो मनु


पुत्र में जीवन मूल्यों के सुसंस्कार रोपित करते पिता के अद्भुत पत्र

. . . . . . . . . श्रीमती सरोजिनी कुलश्रेष्ठ

सुनो मनु नामक इस पुस्तक में लेखक ने अपने युवा पुत्र को उसके उच्च शिक्षाकाल के दौरान छात्रावास में निवास करते समय पत्रों के माध्यम से आज के भोगवादी बाजार के पंक में फंस जाने के खतरों से मित्रवत सावधान किया है। इसमें पुत्र की सामान्य समस्याओं से लेकर जीवन मूल्यों से जुड़े प्रश्नों पर विमर्श किया है। विद्वान लेखक ने पत्रों में विद्वता न बघारते हुए सहजता से न केवल सत्साहित्य का महत्व प्रतिवादित किया है अपितु साहित्य के आधारभूत मूल्यों को, मानव जीवन के मूल्यों द्वारा परिष्कृत एवं संरक्षित करने हेतु अनिवार्य बताया है। इन्हीं मानव मूल्यों से व्यक्ति की योग्यताओं, क्षमताओं एवं दक्षताओं की वृद्धि होती है और नम्रता, निर्भीकता तथा नियमितता के गुण विकसित होते हैं जो आगे चलकर जीवन में सादगी, संतोष, सेवा, सौहार्द, संयम, सदाचार, स्वावलंबन, स्वाध्यायी, सद्भाव, सामंजस्य जैसे विशिष्ठ गुणों या जीवन मूल्यों को अंगीकार करते है।

आज के इस भोगवादी युग में युवावर्ग के समक्ष नाना प्रकार की समस्यायें हैं जो पूर्व में नहीं थीं। नवीन रंगीन माध्यम ने युवा को इस कदर सम्मोहित किया है कि उसे पश्चिमी भौतिक चकाचौंध में, स्वविवेक बौतना प्रतीत होने लगा है। उसके समक्ष भोग की दानवी पिपासा है जो नैतिक दरिद्रता के साथ-साथ आर्थिक दरिद्रता तथा कुसंस्कृति के भयानक अभिशाप की ओर अग्रेषित करती रहती है। इसी के कार समाज में अपराध बढ़ रहे हैं। अपने भोग की लिप्सा की तुष्टि के लिए युवा Beg, buy borrow or steal or even murder जैसे जघन्य अपराधों तक को करने में नहीं हिचकता।

सुनो मनु में लेखक ने एक मनीषी, कवि, विचारक, चिंतक, दार्शनिक, खिलाड़ी, प्रकृति प्रेमी तथा आलोचक होने के नाते अपने युवा पुत्र में सुसंस्कार रोपित करने का सफल प्रयास किया है तथा प्रगति के नाम पर आधुनिकता दिखाने की होड़ में पिज्जा, बर्गर, कोला, पॉप म्युजिक, ड्रिंक, और डांस की आड़ में विकृत सेक्स संस्कृति के प्रति भी बहुत ही तर्कपूर्ण शैली में आगाह किया है।

लेखक ने एक जिम्मेदार पिता होने के नाते रंगीन माध्यम द्वारा परोसी जा रही कुत्सित आधुनिकता को समझाते हुए भारतीय परंपरा की नैतिक, मानसिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत संरक्षित रखते हुए, भारत को विश्व में सम्मानजनक स्थान बनाए रखने के लिए प्रयत्न करने का संदेश दिया है। इस पत्राचार में एक और वैशिष्ट्य जो दृष्टिगत होता है वह यह है कि विद्वान लेखक ने अपनी विद्वता या पिता होने के हक से पुत्र पर अपने विचारों को थोपने का किंचित भी लोभ नहीं किया है, वरन पुत्र को स्वविवेक, अपने जीवन को जांचने की सलाह दी है ताकि एक विकासशील युवा की तरह वह स्वयं निर्णय ले सके आखिर वास्तविक सुख भोगवाद में है या त्यागमय भोग में? सच्ची आधुनिकता एवं प्रगति वास्तव में है क्या?

लेखक की यह पुस्तक संपूर्ण युवा वर्ग के साथ-साथ उनके माता पिता एवं अन्य अभिभावकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। भाषा, शिल्प, शैली, विषयवस्तु, बोधगम्यता तथा शुभ संदेश के संप्रेषण में सक्षम यह संकलन उत्कृष्ठ तो है ही महाविद्यालयों के सेलेबस में शामिल किए जाने की समुचित पात्रता रखता है। ऐसी अनुपम कृति प्रस्तुत करने के लिए लेखक को जितना भी सराहा जाय कम है।


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