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Sunday, August 14, 2011

दुश्मन भले ही कुछ कहे

स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व-संध्या पर ब्लॉग के सभी मित्रों एवं पाठकों को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। चूंकि मौक़ा है
और दस्तूर भी है लिहाजा तिरंगे की शान में एक ग़ज़ल पेश है।
दुश्मन भले ही कुछ कहे, दुनिया जहान में
पढ़ते रहो क़सीदे, तिरंगे की शान में।

जान डालता है ये मुर्दों की जान में
झुकता है सर हमेशा, तिरंगे की शान में।

नूर उनका झिलमिलाता है, रंगों में देखिये
कुर्बान हो गए जो तिरंगे शान में।

मिसरे ग़ज़ल के कैसे हों, ये हम बता रहे
तासीर जैसे होती है, तीरो-क़मान में।

मक़बूल हो गए वो, दुनिया में दोस्तों
हस्ती मिटा गए जो तिरंगे की शान में।
मृगेन्द्र मक़बूल
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