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Monday, August 22, 2011

जय भगवान की

भगवान सिंह हंसजी 
आप ने मेरे लेख पर बहुत ही रोचक समीक्षा की है। ये आपका ही कमाल है कि कि आप कि आप किसी चीज़ की पर्त के भीतर पर्त उतारकर वास्तविकता तक पहुंचने की दमखम रखते हैं। मेरा व्यंग्य तो जो था वह था ही आपकी टिप्पणी ने उसे और रोचक बना दिया। जय भगवान की। जयलोकमंगल.
पंडित सुरेश नीरव
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