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Wednesday, September 21, 2011

जो लोग स्वयं को भारतीय कहने में शर्म महसुस करते हैं उन्हें अतिथि बनाकर वे देश के अपमान में अपना योगदान नहीं दे रहे हैं?

मित्रों दो दिन पूर्व फेस बुक पर सुनील जोगी की एक पोस्ट पढी की वे अपने कुछ मित्रों के साथ भारतीय उच्चायोग के निमंत्रण पर लंदन प्रवास पर हैं।समाचार जानकर मन को संतोष हुआ कि चलो देश में ना सही पात्रों का ना सही कुपात्रों का ही सही कुछ सम्मान हो तो रहा है परंतु कल याने २० सितंबर को जब मैने अपना फेसबुक अकाउंट खोला तो पाया कि जोगी जी ने फेसबुक पर लिखने की तमीज़ ना होने का एक सार्वजनिक अभियोग लगाते हुए लिखा है कि यह देश और विशेषकर फेसबुक जैसा महान माध्यम पढे- लिखे अनपढों से भर गया है।
  एकदम से मामला कुछ समझ में नहीं आया तो मैने तो मैसेज़ भी किया कि भाई किसने अंगुली कर दी?
आधा घंटे की मेहनत के बाद जो किस्सा समझ में आया उसका लब्बो-लुआब यह है कि श्रीमानजी लंदन से पहले अभी अमेरिका प्रवास पर थे या यों कहें कि लंदन वाया अमेरिका पहुंचे हैं।अमेरिका मेंकवि सुनीलजोगी फ्राम लंदन कहकर इनका परिचय कराया गया।वहां भेजने वाले संस्थान और आयोज़कों का जोगी ने कुछ इस कदर गुण गान किया कि कोलकाता से प्रकासित होने वाले हिंदी सांध्य दैनिक के संपादक कुंवर  प्रीतम ने फेसबुक पर कुछ इस संदर्भ मेम लिखा जिससे क्रोधित होकर सुनील जोगी ने फेसबुक पर लिखने वालों के लिए पढे-लिखे गंवार से लेकर ना जाने क्या क्या टिप्पणी कर डाली थी।
इसके बाद जोगी जी के आरोपों का ज़बाब देने के लिए कुंवर प्रीतम ने अनेक किस्से बयान किये जिसे जिज्ञासु पाठक फेसबुक पर खोज सकते हैं।
मित्रों इस संदर्भ में अनेक टिप्पणियां फेसबुक पर आयीं पर एक टिप्पणी जिसका ज़बाव मैं खोज़ रहा हूं आप भी खोज़ें वह या थी-------"मेरे चाचा २० वर्ष से फ्लोरिडा हरियाणा में रहते हैं पर अपने को हमेशा हरियाणा का बताते हैं ऐसे में सुनील जोगी अमेरिका से लंदन जाते हुए फ्राम लंदन कैसे हो गये?
दोस्तों मैं एक बुनियादी सवाल उठा रहा हूं कि हम कवि लोग मंचों से देश प्रेम और नैतिकता की बातें करते हैं पर अगर विदेश की धरती पर जाते ही फ्राम लंदन हो जायें,स्वाभिमान को एक तरफ रखकर आयोजकों के चरणों में इस हद तक नतमस्तक हो जायें कि हमारे शुभचिंतकों तक को शर्म आने लगे तो दो जून की रोटी के लिऐ कविता करना ज़रुरी है क्या?
दोस्तो एक प्रश्न और आपके हवाले कर यह पोस्ट समाप्त करता हूं कि विदेश मे देश को अपमानित करने वाले इस वाकये के लिए आयोजकों चाहें वह सरकारी हों या गैरसरकारी को भी जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए?
क्या लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग से नहीं पुछा जाना चाहिए कि जो लोग स्वयं को भारतीय कहने में शर्म महसुस करते हैं उन्हें अतिथि बनाकर वे देश के अपमान में अपना योगदान नहीं दे रहे हैं?
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