There was an error in this gadget

Search This Blog

Thursday, September 22, 2011

अमीर भिखारी


हास्य-व्यंग्य-
अमीरों के देश में
पंडित सुरेश नीरव
भारत अतीत में सोने की चिड़िया हुआ करता था। हमलावरों ने इसे खूब लूटा। हालत इतनी पतली हो गई कि बाल-बच्चों की तो बात क्या इंडिया के राष्ट्रपिता तक लंगोटी में आ गए। लंगोटी भी अपने चरखे के दम पर। फिर वो दिन आया जब ईमानदार शासन,स्वच्छ प्रशासन और योजना आयोग के कठोर अनुशासन की बदौलत देश सोने का कबूतर बन गया। कबूतर इसलिए बना क्योंकि मुश्किल को सामने खड़ा देखकर सिर्फ कबूतर ही आंखें बंद कर सकता है। भारत को ऐसे ही लोटन कबूतर से प्रेरणा मिलती है। इसीकी बदौलत भारत फिर आज सोने की लंका नहीं सोने का इंडिया बन गया। फुटपाथ से लेकर बंगलों तक अमीरी ही अमीरी बिखर गई। गरीबी क्या होती है ये जानने आम भारतीय स्विटजरलैंड या अमेरिका-जैसे गरीब मुल्कों में जाने लगे। सन 2011 में तो भारत की अमीरी संपन्नता की कुतुबमीनार पर उछल कर जा बैठी। कीमतें उछल-उछल कर उसे नीचे उतारना चाहतीं  मगर अमीरी उन्हें भी अपने हाथों से कैच कर लेती। ये वो दौर था जब ढूंढे से भी कोई गरीब भारत में नहीं मिलता। अमीरी का आलम ये कि लोग जितना धन देसी बैंक में रखते उससे हजार गुना ज्यादा धन स्विसबैंक में ले जाकर पटक देते। घपले भी होते तो हजार-दस हजार करोड़वाले सम्मानजनक घपले। साल में चार-चार बार सरकार मंहगाई बढ़ा देती और पब्लिक सरकार की इस शरारती अदा पर खूब हंसती। क्योंकि उसके लिए तो योजना आयोग का लाइफ बेल्ट हमेशा मुस्तैद रहता। मंहगाई तो दुनिया को दिखाने के लिए होती थी। जब बाजार में एक रुपये का एक आलू मिलता तब भी योजना आयोग अपनी प्रजा को सिर्फ चवालीस पैसे में सब्जी और फलों से लवरेज और लजीज भरपेट भोजन मुहैया करा देता। ये बात दीगर है कि अठन्नी से कम का सिक्का तब बाजार में चलता ही नहीं था। इसलिए स्वेच्छा से जनता छह पैसे सरकार को दान कर देती। जिससे सरकारी खजाना भी तमाम घपलों के बावजूद हमेशा  भरा रहता। और योजना आयोग  की सेहत भी चकाचक रहती। थोड़ी बहुत कमी होती तो सरकार झट विदेश से कर्जा लपक लेती। दूध की नदियां बहानेवाले देश में जब दूध की सरकारी रेट 29 रुपये लीटर होता तब योजना आयोग उसे चुपके से 2.33 पैसे में भरपेट दूध पिलवा देता। मकानों की हालत ये कि सिर्फ 49.10 पैसे हर महीने खर्च करने कि जिसकी कुव्वत होती उसके लिए दिल्ली-जैसे शहर में योजना आयोग की बदौलत मकान किरायेदार के पास खुद चलकर आ जाते। ये बात और है कि तब भी कुछ बिगड़ैल रईसजादे इतनी सुविधाओं के बावजूद 200 रुपये की अकूत संपत्ति पुलिस पर लुटाकर  शौकिया ही फुटपाथ पर सोते और ठसक में अपने को भिखारी बताते। क्योंकि तब इंडिया में कोई भिखारी होता ही नहीं था। ये नंगे पैर रहते जबकि योजना आयोग तब जबकि बाजार में घटिया-से-घटिया जूता 120 रुपये में मिलता हो इन्हें सिर्फ 9.60 पैसे में जूते मुहैया कराने को आमादा रहता। मगर ये नेता पर फेंकनेवाला जूता तक पांचसौ रुपयेवाला ही खरीदते। बड़े रईस भिखारी थे। बिलकुल लखनऊ के उजड़े हुए नवाबों से नखरीले।  योजना आयोग इन्हें मय कॉपी-किताब 29.60 की टिटपुंजिया फीस पर शानदार स्कूल में पढ़ने के सुनहरे मौके मुहैया कराने में जुटा रहता था फिर भी ये लोग नर्सरी में एडमीशन के लिए पचास-पचास हजार रुपये अपनी ठसक और ठरक में खर्च कर दिया करते। योजना आयोग की बदौलत देहली-बंबई-जैसे शहरों में तब आदमी 3,890 रुपये मासिक खर्चे पर शान से अपनी ज़िंदगी बसर कर लेता था। और क्या चाहिए था पब्लिक को। और ये सब करिश्मा था नोट के बदले वोट के बूते चल रही दूरदर्शी सरकार का। तमाम खर दिमाग जिन्हें इस चमत्कार पर भरोसा नहीं होता उन्हें लोग योजना आयोग का वो हलफनामा पढ़वाते जिसे सीना तानकर,अखबारों में छपवाकर सुप्रीमकोर्ट में योजना आयोग ने पेश किया था। ये वो दौर था जब इंडिया में सबसे कम अमीर आदमी भी 3.50 हजार रुपये हर महीने कमाता था। सरकार भी दिल खोलकर पब्लिक पर खर्च करती रहती थी। आतंकी हमलो पर मरनेवालो तक के परिवार को दस-दस लाख रुपये खुशी-खुशी दे देती। सब सरकार और सरकार के योजना आयोग की माया थी। अगर 2012 में प्रलय नहीं आई तो विद्वानों का मानना है कि आगे भी सरकार और उसका योजना आयोग देश की अमीरी को मजबूती से बरकरार बनाए रखेगा।
आई-204,गोविंदपुरम,गाजियाबाद-201013
मोबाइल-09810243966
Post a Comment