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Tuesday, September 13, 2011

तन- मन -धन सब दिया देश को फिर भी कोई लहर ना आई-

 वर्डसबर्थ मे एकजगह लिखा है कि यदि दीवार हो तो कील की जरूरत पड़ती है और कील हो तो दीवार तलाशनी पड़ती है तभी कोई अपनी कमीज करीने से  टांग सकता है। यानीकि असली चीज़ है कमीज़। भावनाओं की कमीज। देशभक्ति की दीवार पर लेखनी की कील ठोंककर बिस्मिलजी के चरित की जो कमीज़ अरविंद पथिक ने टांगी है,वह कमीज बनी तो कवि की भावनाओं के धागे से ही है। फांसी पर चढ़ने से पहले शहीदेआजम की क्या मनःस्थिति रही होगी इसका बड़ा जीवंत चित्रण अरविंद ने किया है। फांसी पर चढ़ने के वक्त हर शहीद यही सोचता है कि उसके बलिदान की सुगंध से सोए हुए लोग जाग जाएंगे। मगर हर बार क्या ऐसा हो पाया है,इसी गूढ़ गुत्थी को सुलझाने की कोशिश है उनकी ये पंक्तियां-
इस कायर समाज की खातिर क्यों मरना सूझा था तुझको?
तू तो उच्च वर्ण कुल का था तेरे घर में कौन कमीं थी
तेरे दिल में ही क्यों आखिर देशप्रेम की ज्वाल जली थी ?
देश, सिर्फ तेरा ही नही है, तू भी कर सकता था घातें
तू भी सुख से रह सकता था कर सकता था हंस-हंस बातें
क्रुर -काल से आखिर कब तक चल पायेगी तेरी लडाई?
तन- मन -धन सब दिया देश को फिर भी कोई लहर ना आई-
 कविवर तुम्हें बधाई हो..बधाई हो ..
पंडित सुरेश नीरव
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